बुधवार, 6 अगस्त 2008

नरेगा कानून और बेरोजगारी भत्ता (एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलो’िाप के तहत )

अलोका
झारखण्ड राज्य के अन्तर्गत हजारीबाग जिले के कटकम सांडी प्रखण्ड के लोग लगातार नवम्बर 2007 से नरेगा कानून के अन्तर्गत बेरोजगारी भत्ते की मांग कर रहे है। 04.02 .06 को जाॅब कार्ड दिया गया परन्तु उस जाॅब कार्ड में काम नहीं दिया गया है। कटकमसांडी के महिला पुरूष एवं गांव के तमाम लोगो ने उपायुक्त कार्यालय हजारीबाग में घरना दे कर बेरोजगारी भत्ते की मांग कर रहे है।

पूरी व्यवस्था इतनी अनसूनी हो गयी है कि बार-बार आवाज लगाने के बावजूद मजदूरों के साथ अन्याय रूक नही पाता है। नरेगा कानून के तहत फिर एक बार इस नये बेरोजगारी दूर करने के नाम पर 300 मजदूर नरेगा के तहत काम मांग रहे है। इस 300 मजदूर ने काम का आवेदन 2007 मे ही किये थे लेकिन गांव के लोगो को न काम मिला और न बेरोजगारी भत्ता फिर एक बार सरकार ने मजूदरों को अपने अधिकार देने से वंचित करता नजर आ रहे है। कानून का पालन नहीं हो पा रहा है जब सरकारी पदाधिकारी कानून का पालन नही कर सकते तब आम जनता से क्यों उम्मीद करते है?

झारखण्ड प्रदे’ा मूलतः आदिवासी दलित का क्षेत्र रहा है यहां श्रम की पूजा और अपने श्रम पर वि’वास करते है विगत 15 सालों में झारखण्ड के जल - जंगल और जमीन पर विदे’ाी कम्पनी के नि’ाानें पर है जंगल पानी के अभाव में पन्नप नही रहे है जिससे वायू प्रदूषण तेज होता जा रहा है पूराने बचे हुए जंगल पर व्यापारियों का कब्जा होता चला जा रहा है। वही जीमन के उत्पादन के घटने से भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जा रहीं है। उत्पादन का कम होना बेरोजगारी को बढ़ावा देते चले जा रहे है इस बेरोजगारी पलायन को बढ़ाव देती चली जा रही है। लेकिन बचे हुए कुछ गांव अपने श्रम के बल पर आज भी जीवित हैं। उस गांव में रहने वाले लोग आज भी बेरोजगारी है काम पाना चाहते है। नरेगा कानून उन किसानों के लिए खरा नही उतर पा रहा है जिनके किसानों के लिए रिन माफ करने का वादा किया हो।

गरीब सरकारी प्रक्रिया में लम्बे समय तक जुझता है। आखिर में तंग आकर पलायन करने की सोचते है। गरीबों के नाम पर बनने वाले कानून से गरीब लाभ नही उठा पा रहे है। जबकि अपने अधिकार को लागू करने उस अधिकार को पाने के लिए लम्बे समय से संघर्ष करना पड़ता है। जैसा की झारखण्ड के हजारीबाग मे हो रहे है। सरकार उन्हें न रोजगार मुहैया करा पा रही और न बेरोजगारी भत्ता ही दे पा रही है। बेरोजगारी भत्ते के मांग के लिए कटकमसांडी के गांव के लोग लगातार उपायुक्त कार्यालय के सामने घरना दे रहे है।

बेरोजगारी भत्ता पाने वाले चिन्तामन राम ने बताय कि हमारा अधिकां’ा समय सरकार के बनाए कार्यालय में घुमते - घुमते बीत जाता है वहीं सरकार की तमाम प्रक्रिया और विकास संबधी योजना प्रखण्ड कार्यालय आती है। प्रखण्ड कार्यालय के प्रधान पदाधिकारी अपनी मनमौजी करते है। वे पैसा से पैसा बनाना चाहते है जबकि कितने गरीब लोगों के परिवार आज भी 20 रू0 में अपने जीविका चला रहे। कितने परिवार आज भी एक ही समय चुल्हा जलते है हर दिन कमाने पर भोजन प्राप्त हो सकती है। आज भी मजदूरो के नाम पर छलावा है उसका खमियाजा मजदूर और किसान ही भूगते है। कारण कि अपने पेट के लिए इस ’ाहर से उस ’ाहर से मजदूरी करने जाते हैं जिससे एक रि’ता भी बन जाता है लोग आहिस्त से पहचाने लगते है और अपने अपने काम के अनुसार हमें बुलाते है सरकारी कानून, योजना इस रि’ते को तोड देता है। एक क्रम से अपना बना था टुट जाता है। बहुत कम समय हम सरकारी लाभ उठा पाते है।

सिलादेवी लुटा गांव की रहने वाली हैं। किसी के खेत में काम करके अपनी आजीविका चला रहे थे। इस कानून के आते ही गांव के ग्रामसभा के अघ्यक्ष के लोगो ने बिना बैठक कराए र्फाम भरकर ले गये और कहा कि इसके आधार पर अब सरकार सभी गांव वाले को काम देगी और यदि नही देगी तो बदले में बेरोजगारी भत्ता देगी। हम गांव वाले समेट लगभग 50 ंलोगो नेेे इकट्ठे काम का आवेदन दिया । आवेदन हमने 2007 में दिये हमें काम नही मिला करीब 15 दिनों के बाद हम लोगो ने बेरोजगारी भत्ते की मांग की उसके लिए डी डी सी, ब्लाॅक, कार्यालय, में चकर काटते- काटते 2008 हो गयें बेरोजगारी भत्ता नही मिला फिर हम लोगो ने उपायुक्त कार्यालय के समक्ष धरना देना ’ाुरू किये जिससे कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा है।

उधर भारतीय कम्युनिस्ट पाटी (माक्र्सवादी ) के जिला सांगठनिक कमिटि नरेगा में हो रहे गड़बड़ी को लेकर धरना दे रहे है। और लगातार यह मांग कर रही है कि बेरोजगारी भत्ता का बिना देर किये ग्रामीणों को दिया जाए तथा सभी जाॅबधारियों को काम दिया जाए इस मांग के साथ लगातार संघर्ष चल रहे है। सी पी आई (एम) के जिला सचिव गणे’ा कुमार बर्मा ने बताया कि नरेगा के द्वारा कटकमसांडी में लगातार गड़बडियां हो रही है। जिसकी जानकारी जिला के तमाम सरकारी पदाधिकारियों को है। इसके बावजूद मजूदरों को बेरोजगारी भत्ता नही दिया जा रहा है।

सी पी आई (एम) के जिला सचिव गणे’ा कुमार बर्मा ने कहा कि भारत सरकार द्वारा नरेगा कानून लागू करना@ करवाना जिला प्र’ाासन का परम कत्र्तव्य है। अपने पत्र में अपने प्रखण्ड विकास पदाधिकारी कटकमसांडी को पत्र का उल्लेख करते हुए बताए कि मजदूरों को सामूदायिक भवन में काम करने की जानकारी दी गयी परन्तु मजदूर काम करने नही आये। प्रखड विकास पदाधिकारी 03.10.07 को ये पत्र लिखते है। और मजूदरेां को लिखित सूचना 7.10.07 को दिया जाता है। इससे ये साफ प्रतीत होता हैं कि कानून के प्रावधानों का लाभ मजदूरों को न मिले इसलिए भ्रमक सूचना दिया। ऐसे भी इसका विरोध पार्टी नेे धरना के माघ्यम से उपायुक्त हजारीबाग के पास 90.10.07 को दर्ज करवाया है।

यदि प्रखण्ड विकास पदाधिकारी की बात को मान भी ले तो क्या बन रहे सामुदायिक भवन में 45 मजदूरों का विधिवत ( मजदूर को लगातार 14 दिन रोजगार सप्ताह में 6 दिन से अधिक नहीं) तरीके से कार्य दिया जाना संभव है? जाहिर है नही इसलिए ये मजदूर बेरोजगारी भत्ता पाने के योग्य है। क्या जहां समुदायिक नई भवन बनाया जा रहा है वहां मजदूरों के लिए नरेगा क तहत उपलब्ध सुविधाएं है? यदि सुविघाएं नही है तो मजदूर वहां काम करने क्यों जाएगी इसलिए भी मजदूरेां को बेरोजगारी भत्ता पाने के हकदार है। प्रखण्ड कृषि पदाधिकारी का ये कहना है कि 12 मजदूर ’ाहर में काम करने जाते है और यह बात भी सत्य है 12 क्या 12 से ज्यादा मजूदर बाहर काम करते हैं वे लोग रोज कमाते और रोज खाते हैं

यदि एक दिन भी बैठ जाए तब उनका परिवार कैसे चलेगा गांव में रोजगार नही मिलेगा तो काम की तला’ा में ’ाहर तो जाएगे ही। नरेगा कानून का उदे्द’य ही है। पलायन रोकना और ग्रामीणों को उसके गांव में 5 कि0 मी0 के अन्दर काम उपलब्ध करवाना है। इन तमाम कारणों के साथ उपायुक्त को पत्र लिखे जा चुके किन्तु नरेगा के तहत किसी भी लोगों को बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया गया है।

झारखण्ड में नरेगा फेल होने का बड़ा कारण पंचायत चुनाव का न होना लगता है। दुसरी ओर सरकार ने आदिवासी दलित समाज के परम्परागत सभा को मान्यता नहीं दी है। सरकारी पदाधिकारियों द्वारा ग्रामसभा का गठन किया जाता रहा है। उसके माघ्यम से नरेगा कानून को लागू करने में परे’ाानी हो रही है। जिससे लोगो को रोजगार नहीं मिल रहे है। ऐसी स्थिति में पलायन लाजमी है।






शनिवार, 5 जुलाई 2008

महिलाओं के गरीबी और भूख को मिटाने नरेगा कारगर नही हैं।

अलोका


2 फरवरी, 2006 से देश के 200 जिलों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून 2005 लागू हो चुका है। झारखंड के 22 जिलों में से 20 जिले में इस कानून के अंतर्गत कार्य ’ाुरू हो चुका हैं देश के स्तर पर देखें तो सार्वधिक जिले झारखंड को ही मिला है। यह कोई खुश नसीबी की बात नहीं है। ज्ञात हो कि झारखंड की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। भूख से मौत और पलायन एक बड़ी गंभीर समस्या है। लम्बे समय से झारखण्ड के कई जिले के लोग देखते आ रहे कई योजना आई और गई किन्तु झारखण्ड के गरीबी को समाप्त नही कर पाये और फिर एक कानून गरीबी और भूख को मिटाने के लिए लाया गया किन्तु इसे गांव में रह रही महिला को कोई लाभ नही मिल पा रही हैं क्योंकि झारखण्ड की गांव की महिलाएं निरक्षता के मार से उबर नही पाया हैं और रोजगार गांरटी कानून के द्वारा महिलाओं को कम लाभ उठा पा रही जिसका नतीजा यह हुआ कि वे दुसरे ’ाहरों की ओर पलायन कर रोजगार तला’ा कर रही हैंझारखंड जैसे राज्य में जहाँ गरीबी और बेरोजगारी है। लोग रोजी रोजगार के लिये पलायन कर रहे हो तथा किसी तरह 2 जून की रोटी जुगार मुश्किल हो रहा है। रोजगार गारंटी कानून को लागू करने व हर संभव हर स्तर पर लागू करने का प्रयास ना कामबयाब ही दिखाई दे रहा हैं। झारखण्ड के जिला गिरिडीह में महिलाअेां के पास रोजगार के नाम पर कुछ भी नही मिला कई दलित परिवार हैं जिनके लड़कीया गरीबी के कारण बेच दिये जा रहे हैं। एक “ाोध के आधार पर लिखी गयी किताब (गिरिडीह की बेटी रूप की मंडी )के आधार पर कई सौ लडकियां दूसरे “ाहरों में बाह कर बेच दी गयी। भूख और गरीबी ने सौदा सिफ लडकियो का ही होता रहा है।दलितो पर कार्यरत रामदेव ने लोगों को बताया कि कोई भी कानून लोगों के अधिकार के लिए है। इस कानून को जमीन में उतारने की जरूरत है। यह कानून आपके मांग और पहल पर निर्भर करता है। रोजगार गांरटी कानून, जाॅब कार्ड के बारे में लोगो को जानकारी सरकार कि ओर से देनी चाहिए। झारखण्ड में पंचायत चुनाव नही हुआ हैं। चुनाव नही होने के कारण कई सरकारी योजना जमीन स्तर पर नही उतारा जा सका हैं। जनती अपने व्यवस्था के अन्तर्गत नही आयेगी तब तक लोगो का विकास संभव नही तब तक भूख और गरीबी समाप्त नही हो सकती है। गिरीडीह जिले के महिलाएं रोजगार की खोज में हैं किन्तु इस योजना के बारे में महिलाओ को कम जानकारी हैं। जनकारी के अभाव में लोगो को योजना का लाभ नही हो पा रहा है।लक्ष्मी चरण महतो ने कहा कि आजादी के बाद हमें जो शक्ति मिली है। यह जनाधार को मजबूत करने के लिए मिला है। आनेवाले समय में हम अधिकार और अधिकारियों की यथार्थता को जानेंगे। इसके नहीं मिलने पर कानूनी हक प्राप्त करेंगे। महिलाओं को समाज में समान दर्जा प्राप्त होगा। हर बार महिलाएं पीछे छूट जाती रही है। उन्हे किसी भी योजना का लाभ नही हो पाता है। क्येां कि ब्लांॅक स्तर पर बिचैलिया किस्म के लोग ज्यादा रहते है। उनका कहना हैं कि यदि कुछ महिला को रेाजगार मिल भी गया तो तो उसे समय पर भूक्तान नही हो पा रहा है। जिससे आधा अधूरे काम कर महिला महानगर की ओर पलायन करने में ज्यादा रूचि ले रही है तथा काम कैसे-कैसे प्राप्त किया जा सकता है आवेदन का प्रारूप क्या होगा ? आप हमें कैसा सहयोग करते रहेंगे ? आपकी इसमें अभिरूचि की क्या पेशा है ? आदि क बारे में महिला को कोई जानकारी नही हैं।चंद्रशेखर ने कहा कि गिरीडीह के गंाव में नारेगा के तहत जितने काम दिये जाएगे उस काम से जो होना हैं उससे आम आदमी को कोई लाभ नही मिलेंगा क्यों कि यह क्षेत्र कोयला के रहा हैं आधी से ज्यादा महिलाएं कोयला निकाल कर प्रति दिन 150 रूपया कमाती है। इस योजना के तहत हमें सौ रूपये से भी कम पैसा मिलेगा तथा कोयला खदान से विस्थाप हुए समूदाय को तालाब और रोड़ से क्या मतलब वो तो अपने जीविका और अपने स्थान के लिए दर दर भटक रहें है।

महिला श्रमिक आज भी चैराहें पर

अलोका

(एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलो’िाप के तहत )
अपने घर के अन्दर ’ाुरू से कार्यरत्त आबादी महिलाओं की रही है। ’ाायद आज के दौर में महिलाएं 18 घंटे काम कर रही है। उनके श्रम को पूरे दूनिया ने नकारा है। 21 वी सदी वाली दुनिया में महिलाओं के श्रम नगण्य रही है। श्रम की इस प्रक्रिया में महिलाओं का स्थान भविष्य दिखना संभव नहीं हैं। पूरे भारत में महिला कामगार की संख्या घर, मूहल्ले हर कस्बे, हर खेत, हर बस्ती और न जाने कहांं कहां उनके श्रम कर रही है और करती रहेंगी। पंूजी के बदलते दौर में किया गया श्रम किया गया श्रम ही श्रम माना गया है महिलाओं द्वारा किया गया काम सेवाभाव है। जबकि 21 वी सदी का भारत में पूरी- पूरी महिलाएंं अपने श्रम के बल पर अपना जीवन चला रही है बेटी पैदा होने अैर पांच साल की उम्र के बाद उनके श्रम ’ाुरू हो जाते है। इस श्रम को परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र ने कभी स्वीकारा ही नही। परिवार की नीवें रखने वाली, परिवार चलाने वाली महिलाएं होती है।पूरे भारत को नजदीक से देखे तब पाएगे कि महिलाए श्रमिक की संख्या सबसे ज्यादा है। भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान रहा है। उनकी श्रम के बल पर आज भी समाज, राज्य, परिवार चल रहे है। एक न्यू बुलेटिन में छपे समाचार के आधर पर वि’व बैक की 1989 की रिपोर्ट के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे के 35 प्रति’ात परिवारों की मुखिया महिलाएं है यह परिवार महिलाओ की श्रम, कमाई पर आश्रित है। रिपोर्ट के अनुसार निचले तबको के परिवारों में महिलाओ का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। उत्पादन कार्य में जुटी महिलाएं, श्रम बेचने, श्रम देने एवं आर्थिक उत्पादन पर निर्भर गरीब परिवार महिलाएं है। आज भी दुनिया में समान मजदूरी की लड़ाई जारी है। गरीब परिवार के महिलाओं को आज भी पुरूषो के मुकाबले कम आय (पैसे) मिलते है। परिवार में उनके श्रम को सेवा के रूप में लिया जा रहा है। घर की सुफाई से लेकर बाहर कम किमत पर कार्य कर रही है। इस कार्य की गणना कही भी दर्’ााया नही गया है। एवं गणना नही की जाती है। 21 वी सदी का भारत में सरकारी विभाग, हर प्रतिष्ठान, हर संस्थान, संडकों पर खेतो पर रसोई घर में बाजार, स्वास्थ्य क्षेत्र में हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की मांग बढ़ गयी है। कम पैसे में ज्यादा श्रम देने वालेेेेे आज कोई वर्ग है वह है महिला वर्ग । भारत में महिला श्रमिक के संगठन बनने नही दिया गया है। वि’व की महिला श्रमिकों की लड़ाई क्लारा जेटिलन ने महिलाओं की आजादी की मांग को वि’व स्तर पर उठाया था। भारत में महिलाओं ने अपने अधिकार के प्रति सजग हुई पर गति काफी धीमी रही। सेवा के भावना को तोड कर धीरे- धीरे महिलाएं अपने श्रम को मूल्यों के साथ जोड़ना ’ाुरू किया। वह मूल्य काम घंटे के हिसाब से काफी कम है। आज भी भारत के सरकारी नौकरी करने वाले 2 प्रति’ात महिलाओं को छोड़ कर हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के श्रम को आय काफी कम है। इस प्रकार के कार्य सीधे अर्थो में अदृ’य रहते है एवं महिलाओं के योगदान पर राष्ट्रीय मानव संसाधन एवं आर्थिक नीतियां कुछ नहीं कहती।क्या कारण है कि महिला श्रमिक वर्ग सबसे ज्यादा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत्त है। 1991 में किये गये जनगणना के अनुसार 95 प्रति’ात महिलाएं अंसगठित क्षेत्र में कार्यरत्त है। 5 प्रति’ात महिलाएं पुरूषों के कामगार संगठन ट्रेड युनियन या अन्य संगठन में एका हो लेते है। असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिक जहां उन्हें अच्छी सेवा’ात्र्तो एवं बराबर (न्यायपूर्ण मजदूरी) मजदूरी नही मिलती है। न ही वहां उन्हें उत्पादकता बढ़ाने के अवसर मिलते है। काम करने वाले स्थानों में पानी, ईधन, स्वास्थ्य, सुविधा, एवं पलना घर जैसी सुविधाओं का अभाव रहता है। यौन, उत्पीड़न इस क्षेत्र में अत व्याप्त है। ठेकेदार, कुली, मिस्त्री एवं अन्य पुरूष श्रमिक लडकियों, महिलाअेां का यौन ’ाोषण करते है। गरीबी, जानकारी का अभाव, लोकलाज के कारण बात सामने नही आ पाती है।अंसगठित श्रमिक समाजिक सुरक्षा विधेयक 2007 में महिला श्रमिक कों श्रमिक नही माना है। लोकसभा के स्थाई समिति की कामरेड सुधाकर रेड्डी की अघ्यक्षता में जारी की गई रपट में अंसगठित श्रमिक समाजिक,सुरक्षा विधेयक को प्रस्तुत किया है। उसके कुछ महत्वपूण मुद्दे पर टिप्पणी की जा सकती है। 1। इस विधेयक में उन महिला श्रमिकों को श्रमिक नही माना है जिन्हें वेतन, मजदूरी या बाजार से मुनाफा नही मिलता। वे श्रमिक जो उन संस्थानों में काम करते है जहां 10 से अधिक श्रमिक नियोजित ह, भी सम्मिलित नहीं है, परन्तु यदि संगठन क्षेत्र में कार्यरत होने के बावजूद भी अन्य सामाजिक सुरक्षा काननू का लाभ नही मिलता तब वे सम्मिलत माने जायेंगे। 2। यह विधेय में समाजिक सुरक्षा के लिये श्रमिकों को एक हिस्सा जमा करने का प्रावधान हे। विधेयक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण निधि स्थापित करता है परन्तु इस निधि का प्र’ाासन एवं सामाजिक सुरक्षा के लिए व्यय सम्बन्धी अन्तिम निर्णय के अधिकार सरकार को ही है। 3। सभी अंसगठित श्रमिको का सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करने के लिये पंजीकरण कराना होगा और स्वयं इसके लिए आवेदन करना होगा। 4. विधेयक में सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के गठन के प्रावधान हे। परन्तु वे स्वायत्त (र्आटोनोमस) नही होगे इन राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय बोर्डो में सदस्यों का नामांकन सरकार करेगी। बोर्डो को सिफारि’ा, सुझाव, योजनाओ की समीक्षा, वि’लेषण आदि के अधिकार है। उन्हें कुछ प्र’ाासिनक अधिकार भी है। 5. सह विधेयक सरकार की कई वत्र्तमान योजनाओं को सम्मिलित कर लेता है परन्तु जो सुरक्षा लाभ दिये है वे बहुत कम स्तर पर है। जैसे 500 रूपयें मातृत्व लाभ 200 रूपये वृद्धावस्था लाभ, स्वास्थ्य के लिये अधिकतम 30,000 रू0 एक वर्ष में आदि। इनमें अधिकतर बीमा आधरित लाभ है। इन रा’िायों का औचित्य अस्पष्ट है। 6. यह विधेयक असंगठित श्रमिकों को आजीविका, नियोजन, जल, जंगल, जमीन स्वयं का घर आदि के सामाजिक सुरक्षा अधिकार नही देता। इसमे श्रम अधिकार, सामाजिक सुरक्षा अधिकार, दलित एवं महिला और प्रवासी श्रमिकों के अतिरिक्त सामाजिक सुरक्षा अधिकार आदि क प्रावधान नही है। सेवा ‘’ार्ते, कार्य के समय सुरक्षा आदि के भी प्रावधान नहीं है। विधेयक विवाद सुलझाने के प्रावधान सम्मिलत करता है परन्तु असंगठित श्रमिकों के प्र’ाासन से उत्पन्न विवादों जैसे विस्थापन, आजीविका सम्बन्धित, पुलिस या नगर- निगम द्वारा आक्रमकता सम्बन्धित विवादों को सुलझाने पर गौन है। खेतीहर महिला श्रमिक पूरा काम का जिम्मा लिए हुए है। बीज डालने से निकावन तक खाना बनाने से लेकर बाजार, बच्चे, पति की सेवा तक करती है। उत्पादन के इस कार्य में प्राचीन समय से महिलांए अपना योगदान देती आ रही है। लेकिन महिला किसान के रूप महिलाओं को कभी स्वीकारा नही गया है। उसका श्रम को महत्व भी नही दी गयी है। उनके बने भोजन को चाट कर भी श्रम की बात नहींं कही गयी है। उसी काम को पुरूष द्वारा बाजार में मूल्यों के साथ काम करते हैं तब वह श्रम में माना जाता रहा है। खेत से घर तक का पूरा काय्र महिलाएं अपने बल पर करती रही है। इसक कार्य को करने में उन्हें श्रमदान करना पड़ता है।भारतीय संविधान प्रंजातंत्र एवं समानता मूलक रहा है। परन्तु यह वास्तव में समानता की बात स्वीकार सकते क्या? दे’ा में कमजोर तबको तक यह अधिकार पहुंच पाई है। सत्य कहे तो नही पहुंच पाई हैं। सामनता के अभाव के बिना महिला श्रमिक वर्ग ’ाोषण में ढकेले गयें है। वे मुख्यधारा से आज भी बाहर है और जीवन की कुरूरतम से भाग कर अपना बचाव करते है। 60 साल आजादी वाला दे’ा में महिलाएं आज भी मुत वाले चुल्हा- चैका से साथ कम किमत पर काम करने बाहर जाना पड़ता है। आज भी 65 प्रति’ात महिलाएं अ’िाक्षा के ’िाकार है। सबसे ज्यादा गरीब तपका वर्ग महिला है। जिन्होने लम्बे- समय से मुत में श्रम दान देती आ रही है आज भी महिलाएं 18 घंटा काम करती है एवं आम महिला श्रमिक को सामाजिक सुरक्षा, मानवाधिकार, समान पारश्रमिक, कारगार व्यवस्था, आवका’ा, मातृत्व लाभ, विधवा, गुजारा भत्ता, कानुनी सहायता से आज भी वंचित है।अलोकाएच
बी रोड़ थड़पखना

महिला होने पर नरेगा के लाभ से वंचित ( अलोका एन. एफ. आई एवं ए. आई एफ फेलोसिप के तहत )

।निजीकरण के इस दौर में पूरे भारत में तेजी से बेरोजगारी बढ़ी है। इस बेरोजगारी ने भारत के हर प्रंात मे राजनीति, समाजिक, आर्थिक स्थिति को चरमरा दिया हैै। जिससे आने वाले भविष्य एवं ग्रामीण जनजीवन पर व्यापक असर पड़ा हैं हर क्षेत्र मे बेरोजगारी की भार से समूचित समाज की संरचना ही बदल गयी है। कही पलायन तो कही भूख से मौत कही लोग गरीबी और बेरोजगारी के कारण गांव ही बेच दे रहे हैं। इस वक्त भारत सरकार ने लोगो को राहत के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कानून बना कर लोगो को राहत देने का काम किया। किन्तु यह कानून क्या महज कानून ही बन कर ही रह जाएगे। आजादी के बाद ग्रामीणों को साल ंमें 100 दिन के काम के अधिकार की महत्व उतनी हैं जीतना जीवन के लिए पानी। झारखण्ड में इस कानून का खास महत्व है। झारखण्ड एक ऐसा राज्य है। जहां प्राकृतिक संपदा सबसे ज्यादा होने के बावजूद यहा के लोगो को रोजगार का अभाव है। लूट खसोट की व्यवस्था ने पलायन करने पर मजबूर कर दिया है।इस कानून को लागू कराने के लिए दे’ा भर में अरूणा राय, ज्यां द्रेज ,निखिल डे नेतत्व में आंदोलन हुआ था जिसका परिणाम हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांंरटी कानून 2005, महाराष्टा में 1977 से लोगों को रोजगार के अधिकार व कानून बनने के बाद,ग्रामीण बेरोजगार अकु’ाल, नरेगा के साथ झारखण्ड राज्य में इस कानून को परिकल्पित की गई है। फरवरी 2006 को लागू होने के उपरान्त प्र’ाासन के कच्छप चाल से रोजगार के अधिकार से वंचित किये जाने लगी चाईबासा की ग्रामीण गरीब, बेरोजगार जनता।वही चाईबासा के गांव में इस कानून का पालन नही किया गया है। खुटपानी ब्लाक के उपर टोला,टोनटो ब्लाक के झीरजोर, कुईल सुटा,रूटागुटू सारजोम बुरू उडेलकम में रोजगार कार्ड के बारे में वहां के लोग नही जानते हैं। जबकि वह गांव आदिवासी क्षेत्र है। वहां कि 528 परिवार के लोग रह रहें उन्हे रोजगार की जरूरत हैं। इस गांव को आवेदन भराया नही गया हैं। ग्राम प्रधान इस गांव के लोगो को अलग कर के आवेदन दिया गया। समाजिक कार्याकत्र्ता ज्योत्सना तिर्की ने बताया कि वहां के ग्रामीणो को महिला होने के कारण अलग कर दिया हैं। जबकि उन परिवारों को रोजगार की जरूरत हैं। किस गांव में आवेदन भरा गया कि नही इसकी जानकारी या निरक्षण नही किया गया हैं। बल्कि नारेगा प’िचम सिंहभमू में कागजो पर चल रहें हैं। जिसके परिणाम हैं कि कई गांव में नारेगा कानून को लोग नही जान पायेे हैं। जबकि इस कानून को लोगो तक पहुंचाने का काम ग्राम प्रधान और ब्लाॅक पदाधिकारी के द्वारा जानकारी देना हैं वह भी नही हो रहा हैं।उन्होने बताया कि पंजीकरण के लिए पंचायत सेवक द्वारा एक लिस्ट जारी किया गया है। जिसमें तय कर दिया गया हैं कि किनको आवेदन करना हैं। ग्रामीण क्षेत्र में बहुत ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें वास्तव में रोजगार की आव’यकता हैं। 2 रूपये में आवेदन र्फाम बेचे जा रहे है। 25 से 45 रू0 में फोटो खिचाया जा रहा हैं नारेगा से एक नया व्यापार का जन्म हो रहो हैं।चाईबासा के सुदूर गांव मे केन्द्र सरकार द्वारा इस कानून के बारे में अखबार, रेडियों, दुरदर्’ान द्वारा जनता को जानकारी दी गयी हैंंं। चुंकि ब्लॅाक में कई प्रकार के योजनाएं चल रही हैं। यह पहला कानून हैं जिससे दे’ा में गरीबी और भूख से मौत को रोकने के लिए बनाया गया है। इसे बार- बार लोगो को अधिकार के प्रति सजग करने के लिए चेतन का विकास का प्रयास ब्लाॅक के द्वारा करना चाहिए। जिससे ब्लाॅक के अधिकारी निभा नही पा रहें। चाईबासा के टकराहातु, डिलियामार्चा गांव में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के बारे में जाॅब कार्ड की स्थिति का जायजा लेना तथा आवेदन करने पर हो रहे समस्या पर बात कि गर्यी। मालती वानरा ने बताया कि चाईबासा में रोजगार गारंटी कानून के तहत लोगो को सफेद कागज में आवेदन कर सकते हैं, आवेदन के बाद आवेदक को जाॅब कार्ड उपलब्ध किया जाएगा । जाॅब कार्ड मिलते ही रोजगार के लिए आवेदन करें जाॅब कार्ड में फोटो साटना तुरन्त जरूरी नही आप बाद में भी फोटो दे सकते है। आवेदन देना , फोटो खिचवाना तथा जाॅब कार्ड निः शुल्क में ग्राम सेवक द्वारा किया जाएगा तथा आप अपने जाॅब कार्ड द्वारा 15 दिन का काम दिया जाएगा इस कानून के तहत 100 दिन का रोजगार की व्यवस्था केन्द्र सरकार द्वारा किया गया है। किन्तु महिला संदर्भ केन्द्र के द्वारा किये गये निरक्षण से पाया गया कि चाईबासा में अल्पसंख्यक 47 परिवार को कार्ड की की प्राप्ति हुईै है। बाकी लोगों को अभी तक नही मिली है। बड़ी संख्या में गांव में लोगो को जाॅब कार्ड नही मिल पाया हैं कई गांव में तो किसी - किसी का फोटो जमा नही है। यह भी पाया गया कि दुसरे के जाॅब कार्ड में किसी और व्यक्ति का फोटो सटा हुआ है। गांव में पंचायत सेवक द्वारा लोगो को आवेदन करने की इजाज+त नही दे रहें हैं। कई तरह के गडबडी यहां हो रहे है। हमे चाहिए की हम एक जुट हो कर अपने अधिकार के लिए आंदोलन करे ताकि सरकारी पदाधिकारी को हम अपने अधिकार के प्रति चेतावनी दे सके हमारी ग्राम सभा में इतनी ताकत है कि हम किसी पदाधिकारी से हम अपना हक ले सके।

अलोका

शुक्रवार, 6 जून 2008

मैं तुझे फ़िर मिलूंगी.....


अमृता प्रीतम जी का लिखा हुआ हो और गुलजार जी की आवाज़ हो तो इसको कहेंगे सोने पर सुहागा ...। यह कविता उन्होंने अपने आखिरी दिनों में इमरोज़ जी के लिए लिखी थी । इस कविता का एक एक लफ्ज़ प्यार का प्रतीक है । अमृता बहुत बीमार थी उन दिनों ...वह अपने आखिरी दिनों में अक्सर तंद्रा में रहती थी । कभी कभी एक शब्द ही बोलती लेकिन इमरोज़ के लिए हमेशा मौजूद रहती पहले की तरह ही हालांकि इमरोज़ पहले की तरह उनसे बात नही कर पाते थे पर अपनी कविता से उनसे बात करते रहते .। .एक बार खुशवंत सिंह जो अपने घर में अक्सर छोटी छोटी सभा गोष्टी करते रहते थे ..इन दोनों को कई बार बुलाया पर यह दोनों नही जाते थे तब उन्होंने पूछा अमृता को फ़ोन कर के पूछा था कि तुम बाहर क्यों नही निकलते हो ..क्या करते रहते हो सारा दिन तुम लोग ?अमृता ने जवाब दिया गल्लां ""[बातें ]उन्होंने हंस कर कहा इतनी बातें करते हो तुम दोनों की खतम नही होती है तब अमृता सिर्फ़ हंस कर रह गई ..पता नही दोनों कैसी क्या बातें करते थे कभी शब्दों के माध्यम से कभी खामोशी के जरिये पर दोनों को साथ रहना पसंद था एक दूसरे के आस पास रहना पसंद था

सोमवार, 26 मई 2008

इन संस्थानों को महिला की सहायता के लिये चलाया जारहा हैं

भारत मे इस समय निम्नलिखित संस्थानों को महिला की सहायता के लिये चलाया जारहा हैं । आवश्यकता पड़ने पर इन से सम्पर्क किया जा सकता हैं । कुछ पत्ते हम सब को अपनी पर्सनल डायरी मे रखने चाहीये ताकि समय पर हम उन्हे दूसरो के लिये उपलब्ध करा सके । कुछ संस्थानों से जुड़ना भी चाहीये पर व्यक्तिगत कारण से अगर ना सम्भव हो तो इनकी जानकारी अवश्य रखे ताकि आप समय रहते किसी की साहयता कर सके
Joint Women's प्रोग्राम
CSIRS, 14 Jungpura B, Muthura Road,
New Delhi : 461-9821Fax: 462-3681।
इंडिया
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शनिवार, 3 मई 2008

अति सुन्दर काया

अलोका
आखे जो झील मे दुबे हो
कमर के सुन्दरता
मेरी अक्खो मे घूमती हो
पुरा का पुर संसार
कायल हो गया
झील सी आखो मे