रविवार, 21 सितंबर 2008
सफदर समूह का काम
पंचायत चुनावों में महिलाओं
aloka
देश में सम्पन्न हुए पंचायत चुनावों में महिलाओं ने जिस तरह पर्दा और चहारदीवारी से निकल कर बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाई है उससे यह तो साबित ही हो गया है कि महिलाएं भी अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई हैं, उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है और नए साहस से लवरेज नजर आने लगी हैं। उनमें अपार ऊर्जा का संचार हुआ है। पंचायत चुनावों में चयनित महिलाएं अब पुरुषों पर निर्भर नहीं रहना चाहती हैं। वे आत्मविश्वास के साथ अपने सभी कामों को स्वयं अपने बलबूते पर करना चाहती हैं। साथ ही वे अपने काम का आकलन भी जरूरी समझती हैं। आरक्षण की बिना पर ही महिलाएं पंचायत चुनावों में नए कीर्तिमान के साथ उभर कर आई हैं। यद्यपि प्रत्येक चुनाव की तरह ही इन चुनावों में भी धन की भूमिका काफी अहम रही फिर भी पैसे के अभाव में भी चुनाव जीतने के कीर्तिमान स्थापित हुए हैं। बिहार के कटिहार जिले के बलरामपुर ब्लाॅक में कीरोरा पंचायत में एक भिखारिन हलीमा खातून मुखिया निर्वाचित हो गई हैं। इसी प्रकार पूर्णिया जिले में भी चाय का ठेला लगाने वाली शांति देवी भी पंचायत सदस्य चुनी गई हैं।
पंचायत चुनावों में नवनिर्वाचित महिलाएं यद्यपि पूरी तरह से उर्जान्वित हैं अब देखना यह है कि रचनात्मक रूप में इस ऊर्जा का किस हद तक उपयोग हो पाता है; क्योंकि क्षेत्र पंचायत में काम करने के दौरान नई-नई कठिनाईयों एवं बाधाओं से जूझना पड़ेगा, और वे उन कठिनाइयों और बाधाओं से जूझने में किस हद तक सफल हो पाएंगी। और फिर उन हालातों में जब पंचायत चुनावों में निर्वाचित होकर जन सेवा करने का भाव गायब होता जा रहा हो और चैधराहट दिखाने की भावना बल पकड़ती जा रही हो।
ग्राम पंचायतों में ग्राम प्रधानों व सेक्रेेटरियों की पौ-बारह है। ग्राम पंचायतों में हो रही धांधलियों पर शिकायत के बावजूद मिलीभगत के चलते प्रशासन द्वारा कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जिसकी वजह से ग्राम प्रधान सेक्रेटरी के साथ मिल कर अपनी मनमानी कर रहे हैं। देश की तमाम ग्राम पंचायतों से विधवा पेंशन, रोजगार गारंटी योजना के जाॅबकार्ड, मिड-डे मील वितरण तथा बीपीएल राशनकार्ड बनाने के तौरतरीकों में हो रही धांधलियों की शिकायत आने के बावजूद उनके निस्तारण पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कुछ ऐसे संकेत मिले हैं कि तमाम जगह तो दंबगई और चैधराहट के चलते ग्राम प्रधान और सेक्रेटरियों की शिकायत करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हैं। अगर कोई शिकायत करता भी है तो उनकी शिकायत को तरजीह देने के बजाय टरकाऊ लहजे से टाल दिया जाता है।
आज हमारा समाज एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। लगभग 61 वर्’ाों के “ाांत सुगम परिवर्तन की प्रक्रिया के बाद महिलाओं को अपने गांव की पंचायत में मजबूती से खड़ा होने का मौका मिला है। जिससे समाज में गुणवत्ता परिवर्तन आया है। भारत के एक दो राज्य के छोड़ कर लगभग सभी राज्यों के पंचायतों में महिलाओं की भूमिका मजबूती के साथ बनती जा रही है। जिससे गांव के अन्दर स्वास्थ्य और ”िाक्षा में मजबूती से काम चल रहा है। जहां-जहां महिला पंचायत के रूप में चुनाव जीत कर आई, उस गांव के परिदृ”य बदलने लगा। हर गांव में सही क्षा का सवाल प्रमुखता से लिया जाने लगा है। समाज कल्याण, परिवार कल्याण और जन-स्वास्थ्य पर पंचायत जिम्मेवारी लेने लगी है।
शनिवार, 20 सितंबर 2008
एक और महिला संगठन बनाना जरूरी क्यों ?
महिलाओं को आधार बना कर अनेकों संगठन पहले से हैं किन्तु उन संगठनों को महिलाओं ने अपनी आव’यकता को देख कर नहीं बनाया बल्कि दुसरे संगठन में एक विग के रूप में महिलाओं का होना तय किया गया। आज तक भारत में जितने भी महिला संगठन हैं वह किसी न किसी संगठन के अधीन बना है। अधिन वाली स्थिति लगातार बनी हुई है। महिलाओं को कभी भी एक वर्ग के रूप में नहीं देखा गया है। अब तक के भारतीय समाज में औरतों के लिए जो ढांचा समाज ने बनाया है महिलाएं उसके अधिन हैं। हमारे समाज का ढांचा पूर्व में सामंती अर्थव्यवस्था आधारित था और अब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था आधारित हैं. क्योंकि इस व्यवस्था की वैचारिक स्थिति भी होती हैै जो समाज के व्यक्ति को उस व्यवस्था के लायक बनाता है। जिसके कारण पुरूषों की तरह इस समाजिक ढांचा में महिलायें भी रहने की आदि हो गयी हैं। लम्बे समय से अधिन रहने कि प्रक्रिया में नये संगठन को बनाना और उसके रूप-स्वरूप पर विचार करना महत्वपूर्ण है। हर बार नये संगठन बनते और कमजोर होते रहें हैं, इस पर विचार करने की जरूरत है। महिला संगठन या आंदोलन के कमजोर होने के मूल कारण जो हमारे सामने स्पष्ट हैं वह है वर्ग के बाहर अब तक महिलाओं को देखा गया है, महिलाओं को अस्मिता के रूप में देखा गया है। जबकि सही तरीके से देखें तो हमारे समाज में उत्पादन और उत्पादन के संबध के साथ जुडे हुए समाज में लैगिक भेद हैं। समाज में उत्पादन में दो तरह के संबध है। 1. उत्पादन के साधन का मलिक होना और 2. उत्पादन के साधनों के मलिकों द्वारा ’ाोषित होना, जिनके श्रम को खरीदा जाता है, यानि मेहनतक’ा। इस आधार पर औरत कहीं भी उत्पादन के साधन की मलिक नहीं है(एक दृष्टि है)। भारतीय समाज में जातिय संरचना है जहां उत्पादन के साधन से महिला से वंचित है। उत्पादन के साधन हंै-जमीन, म’ाीन, फैक्ट्री, आदि। समाज में दो तरह के उत्पादन है -ः 1. अतिरिक्त ( बे’ा) मूल्यः मानव श्रम ’ाक्ति से अतिरिक्त ( बे’ा) मूल्य पैदा होता है। जिससे पूंजीपतियों का विकास होता है। पूंजीवादी संबधांे का विकास होता है और‘’ाोषण की व्यापकता होती जाती है। 2. पूर्णउत्पादन ;तमचतवकनबजपवदद्धरू एक मजदूर अपने औरत के साथ एक मजदूर पैदा करता है। इस हिसाब से समाज, राज्य, राष्ट्र में वह सबसे नीचले पायदान पर है, एक निचले तबके की है और पूंजीवादी समाज में सबसे नीचला तबका श्रम करने वालों का होता है। पंूजीवादी विचार के खिलाफ क्रांतिकारी विचार के आधार पर संगठन न तो बनाने दिया जाता है और न हीं बनाया जाता है। आज तक जितने भी संगठन बने हंै एकल आधार पर ही बनता है- जाति, लैंगिक, मजदूर, आदि का संगठन बनता है। समग्र रूप से देखंे तो महिला आंदोलन एकलवादी आंदोलन है। वर्ग के आधार पर कभी संगठन नहीं बना है। महिला संगठन लैंगिक आधार पर बनता है वर्ग के आधार पर नहीं बनाया जाता है। यदि वर्ग के आधार पर संगठन बनाते, तब आजादी के 60 सालों में महिलाओं की राजनीतिक पार्टियों में महत्वपूर्ण भूमिका होती और महिलाएं नेतृत्व में बहुतायत की संख्या में होती।महिलाओं के लैंगिक-दैहिक ’ाोषण सामंती-पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था के कारण है। यूरोप के दे’ाों में पढ़ी-लिखी औरतों ने अपना संगठन बनाया, जिसमें महत्वपूर्ण नेता ‘सिमाॅन दी वाॅ’ ने भी नहीं समझीं और वह भी लैंगिक आधार पर संगठन बनाती रहीं। उन्होंने इस बात पर घ्यान नहीं दिया। उनकी पुस्तक दी सेकेण्ड सेक्स में उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कहा है कि वे पुरूषांे के अधिन हैं। लेकिन समाज मुक्ति-आन्दोलन के लिए किसी आन्दोलन व संगठन को लैंगिक आधार पर आदमी और औरत में बांटा नहीं जा सकता। इससे समाज के मुक्ति-आन्दोलन के संघर्ष को आगे बढ़ाया नहीं जा सकता और मुक्ति-संघर्ष को उच्च स्तर पर नहीं पहुंचाया जा सकता है। यूरोप में औरतों के आन्दोलन औरतों पर आधारित पुस्तकों, फिल्मों, संगीत की ओर जाने वाला दृष्टिकोण या फिर मोटे तौर पर सांस्कृतिक आधार पर ही रह गये। ‘सिमोन’ कोई छोटी-मोटी बुद्विजीवी नहीं थीं। लेकिन अपने मध्यवर्ग स्थिति के कारण अपने किताब में वर्ग की बात नहीं की। भारत में महिलाओं को जात के आधार पर बांट दिया गया (सबसे निचले स्तर के जातियों के परिवारों में महिलाएं ’ाोषत होती है) । आज तक जितने भी महिला संगठन हैं वह किसी न किसी राजनीति पार्टी के अधिन ही रही हैं। उसका अपना स्वतंत्र समूह बनने नहीं दिया गया है जो अपने वर्ग ‘ मेहनतकश वर्ग ’ के साथ जुड़ कर अपने मुक्ति के संघर्ष को उच्च स्तर पर पहुंचा कर शोषण के इस व्यवस्था को समाप्त करके एक शोषण -मुक्त व्यवस्था बना सके।
शुक्रवार, 22 अगस्त 2008
सोमवार, 18 अगस्त 2008
झारखण्ड की पहली पडहा राजा मुक्ता होरों
अलोका
एन.एफ. आई और ए. आई एफ के तहत फेलोसिप के तहत शोध
झारखण्ड मे पंचायत चुनाव न होने से वहां पंचायती राज व्यवस्था का अस्तित्व खतरे में है। जहां पूरानी परंपरागत स्व’ाासन व्यवस्था की एक मजबूत कड़ी का नाम पड़हा व्यवस्था है। इस व्यवस्था के द्वारा मुक्ता होरो ने अपने जनस्वश्स्छ असं व्यवस्था के अन्तगर्त कई काम करते आ रही है। 14 गांव धीरे -धीरे विकास की प्रगति के पथ पर अग्रसर है। वही गांव से पूरे दुनिया को संदे’ा के रूप में राजधानी रांची से नजदीक बुण्डू ब्लाॅक के पानसकम गांव की महिला मुक्ता होरो लोकतंात्रिक प्रणाली की उपज है।
झारखण्ड की विभिन्न आदिवासी समुदायों के बीच आज भी अलग- अलग परम्परागत स्वा’ाासन व्यवस्था अस्तित्व में है। इन्हीं व्यवस्थाओं में पड़हा व्यवस्था प्रमुख है। 14 गांवो को मिला कर पड़हा का गठन किया जाता है। यानि हर गांव के ग्राम प्रधान को मिला कर पड़हा का चुनाव होता है। यह व्यवस्था मूलतः आदिवासी क्षेत्रों में होता है। पड़हा राजा पद पर वर्षो से पुरूषों का सत्ता कायम की है। किन्तु अब इस पद पर महिलाएं भी चुन कर आ रही है परम्परागत व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक बनाने की दि’ाा में सकारात्मक है। पड़ाह सभा में प्रत्येक गांव के प्रत्येक पंचायत से दो लोग प्रतिनिधि ‘’ामिल होते है। गांव सभा सहमति के आधार पर प्रतिनिधियों का चयन करती है। उनका कार्यकाल 6 साल का होता है। परन्तु हर साल के ‘’ाुक्र में प्रत्येक प्रतिनिधि गांव सभा के सलाना सभा या जलसे के सामने अपने कार्य का व्यौरा रखते है।उसके आधार पर गांव सभा फैसला लेती है। सलाना जलसे में या बीच में किसी भी समय गांव सभा का विस्तार करने की हालत में संबंधित व्यक्ति की सदस्यता अपने- आप समाप्त मानी जाती हैं जहां क इस व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी का सवाल है। तैमारा पंचायत में महिलाओं को एक तिहाई बहुमत 12 साल पहले से प्राप्त है। वहां पड़हा राजा द्वारा खुले रूप से लोकतंत्र के सिद्वांतों का सम्मान किया जाता है। मुक्ता होरों के नेतृत्व वाले पड़हा सभा में गांव की समस्या सड़क, पानी जंगल, ’िाक्षा, स्वास्थ्य, विवाह, बाजार तथा युवा - युवतियों की समस्याओं पर चर्चा कर उनके समाधान व विकल्पों की जला’ा की जाती है। इसके अन्तगर्त तैमारा पंचायत के अन्तगर्त सभी गंाव कोनेगा, मुनीडीह, हुसरीहातू, लबगा, कोड़दा, हाॅंजेद, बेड़ा, पानसकम, आडाडीह, लोआहातू, तैमारा, और अन्य गांव है। इन गांव की कुल आबादी लगभग 16 हजार से अधिक है। इस पदर पर 5 सालों से कार्यरत्त मुक्ता होरो ने बताया कि ’िाक्षा के प्रति गांव वाले ज्यादा सचेत है। हर गांव में एक सरकारी स्कूल हे जिसमें सातवी कलास तक की पढ़ाई होती है। हर गांव का लगभग हर बच्चा स्कुुल जाता है। यदि एक बच्चा सप्ताह भर स्कूल नहीं जाने पर गांव में बैइक हो जाती है। गांव में मैट्रिक की पढ़ाई के बाद बुण्डू काॅलेज जाते है। आवगमन का साधन नही करने के कारण काॅलेज की पढ़ाई में कम लोग जाते है। पढ़ाई के बाद सरकारी नौकरी की आ’ाा है। खेती का स्थान पहले से ही बना हुआ है। जंगल की रक्षा प्रमुख रूप सेे किए जा रहे है। यह पूरा गांव मूख्यतः खेती और जंगल पर आधारित है। पहले की अपेक्षा जंगल की स्थिति में परिवत्र्तन आई है। अतः जंगल बचाने के लिए वि’ोष जोर दिया जा रहा है। जंगल के फल- फुल पत्ती, डाल, जड़ी, बुटी का उपयोग अपने जीवन में करते हैं। गांव की एक महिला बीड़ा मुण्डा ने कही जंगल का घनत्व कम हुआ है। लेकिन यदि इसे बचाया जाएगा तब हम पुर्णः पुराने जंगल की प्राप्ती कर सकते है। तैमारा के ग्रामीण तारालाल सिंह मुण्डा ने कहते हे। गांव सभा ने पड़हा राजा महिला को बनाने से गांव समाज में साकारत्मक परिवत्र्तन आया है। महिला महत्वपूर्ण पद पर आकर निर्णय लेती हे तब चुल्हा चैका से लेकर खेती- बारी और समाज के सभी लोग मूल रूप् से घ्यान दिया जाता है। उनके अनुसार स्वच्छ और स्वस्थ्य परिवार ही समाज के नव निर्माण में भाग ले सकता है। वह गांव में सरकारी योजना से लोगा लाभ नहीं उठा पा रहें हैं। गांव में एकता के बल पर ज्ञान और जानकारी बांट रहे है। दीप थोड़ा ही सही जलाने ने की को’िा’ा की जा रही है।
झारखंड इन्साइक्लोपीडिया
झारखण्ड के ’वेत - ’याम तस्वीर को अपनी सीमाओं के साथ ‘झारखण्ड इन्साइक्लोपीडिया ’ में प्रस्तुत किया गया है। इस इन्साइक्लोपीडिया के बारे में दो बाते अलग से घ्यान दिये जाने योग्य है। पहला सम्मावतः किसी राज्य का यह पहला इन्साइक्लापीडिया है और दूसरा, यह काम सरकारी संस्था के द्वारा न किया जाकर एक सरोकारों वाले प्र’ाासनिक अधिकारी के द्वारा किया गया है। झारखण्ड इन्साइक्लोपीडिया के चार खंडों में कुल 122 लेख संकलित हें जो कुल 1564 पृष्ठों पर फैले है।
बुधवार, 13 अगस्त 2008
बर्ड फुलू से ज्यादा मलेरिया से होती हैं मौत
अलोका
एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलोिाप के तहत
झारखण्ड में ब्र्ड फूलू 2007, मलेरिया हर साल -ः पूरे देा में मुर्गी - मुगी मारने का आदेा आ गया में ब्र्ड फुलू बीमारी भारत के उन गांव तक पहुंच गयी जहां तक विदेाी कम्पनी अपना पैर पसार रही है। यह ऐसी बीमारी है जिससे ग्रामीण क्षेत्र के मुरगे - मुरगी, बत्तख की बिमारी से ज्यादा गांव की परम्परागत लघु उद्योग को समाप्त करने की कोिाा है। यह बिमारी से ग्रसीत इलाका भारत का आदिवासी गांव होते है। जहां किसान कें परिवार छोटे मात्रा में पाु- पक्षी को घन के रूप में पालते है। मलेरिया भारत के गांव और ाहर तमाम स्थानों में फैली हुई है। हर साल मलेरिया से मरने वाले लोगो की संख्या हजारों- हजार है।
यह उस परिवार के लिए छोटा आय को स्रोत रहा है। पूरा का पूरा भारत के गांव में पशु- पक्षी पालने की अपनी अलग परम्परा रही है। मुरगे- मुरगी, भोजन में खाने की पद्वित भी आदिवासी गांव का ही रिवाज रहा। वक्त बदलने के साथ-साथ अन्य समाज के लोगो की पसंदीदा भोजन में मुरगे - मुरगी, खाने का प्रचलन काफी बढ़ गया और वह एक बड़े बाजार mane तबदील होते चले गये यही नही विव स्तर पर यह भोजन (चिकन खाने वाले की संख्या में इजाफा हुआ) प्रचलित हो गये जिससे बाजार में मांग के साथ- साथ व्यवसाय भी बन गये।
जहां- जहां बड़ा बाजार पहुचा वहां- वहां भारी संख्या में गरीबों के लधु उद्योग को धक्का लगा वक्त के साथ भोजन के अन्दाज बदले और यह बाजार व्यापक रूप में सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में फैल गया। चिकन खाने वाले की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। किन्तु अपने परम्परागत पाु- पक्षी की परम्परा में थोड़ा बदलाव आया गांव में मुर्गी पालन को पहले के अपेक्षा ज्यादा हुई हैं किन्तु उसकी बड़ी बाजार गांव के हाट होते हैं इस हाट परम्परागत मुर्गे मुर्गीयां बेचे जाती थी। धीरे- धीरे यह बाजार में देाी मुर्गी के स्थान पर बॅायेलर ने जगह लेना ाुरू ही नही किया बल्कि उसे देाी बाजार उच्ची दाम पर मुर्गे बेचे जाने लगी। और देाी बाजार पर कब्जा होता चला गया। बडे बाजार ने गांव की आर्थिक व्यवस्था को काफी धका पहुंचाया। गांव के इस पाुधन के सामने आर्थिक संकट को देखते हुए मिडिया ने इस ब्र्ड फुलू बीमारी का जबर्दस्त कवरेज दिया। पूरे देा में मुर्गी मारने की खबर अखबारों टी बी में लगातार आने लगे लाखों करोड़ मुर्गी को मार डाला गया। जंगल के किनारे बसे गांव के मुर्गे- मुर्गी को मार कर खतम करने की कोिाा की गयी ताकि एक भी परम्परागत मुर्गीयां ना रहे।
गांव में धुमने के क्रम में देखे कि गांव में मुर्गो की बांग नही हो रही हैं कारण पुछने पर पता चला कि गांव के सभी मुर्गी को मार दिया गया हैं। वन गांव के निवासी मणि सिंह मुण्डा ने बताया कि इस बिमारी से मुर्गी मार कर गांव की अर्थ व्यवस्था को तोड दिया गया, उन्होंने बताया कि ब्र्ड फुलू आज से 60 साल पहले नही थी। आदिवासी क्षेत्रो में इस तरह कि बीमारियां नही थी अचानक से को बिमारी उत्पन्न कर गांव के सारे पक्षी को मार डालने की साजिा है। हमारे समाज में सामुहिकता का जीवन जीते है। पाु- पक्षी भी हमारे कष्ट के दिनों में सहयोगी होते है। अचानक जिस बीमारी का परकोप हमारे गांव में पड़ा उससे लगता है कि अब पैकेट में बंद कर खाना आ रहा जिससे हमारे परम्परागत भोजन को समाप्त करने की योजना है। हमारे यहां गांव में छोटे - छोटे स्थानिय बाजार होते है। मानव आवयकता के चीजे अपने क्षमता के अनुसार अपने घर में रखते है। उसे समाप्त कर पचात देाो के पाु- पक्षी का बाजार फैलाने की जो योजना चल रही। इसका सबसे बड़ा कारण है ब्र्ड फुलू पुरखा के समय में मुर्गी नही मारा जाता था। आज बाजार इतनी हावी हो गये है कि हमारी स्थानिय बाजार को समाप्त कर हमें पंगु बना देना चाहते है। आज भी भारत का गांव अपने श्रम और अपने परम्परागत चीजों के साथ जीवित है। अन्तराष्ट्रीय बाजार की अफवाह में की मार यदि कोई उठाता है तो वह हैं ग्रामीण लोक अर्थव्यवस्था
अड़की के पंचायत के पड़ाह राजा, और समाजिक कार्यकत्र्र्ता पौलूस हेम्बम ने बताया कि हमारे देा में ब्र्ड फुलू से भी खतरनाक बीमारी मलेरिया है। आज तक हमारे गांव से ब्र्ड फुलू बीमारी से एक व्यक्ति की भी मौत नहीं हुई है। जबकि मलेरिया से लाखों लोगो की जान जा चुकी है। इस मौत की खबर अखबार में स्थानिय स्तर पर आते है। मलेरिया को लेकर पूरे देा का अखबार कभी नही लिखे। जबकि ब्र्ड फुलू बीमारी बाजार के साथ जुड़ी है। जिस कारण इसे पूरे देा के मीडिया ने स्थान दिया। मलेरिया को लेकर जिस तरीके से गांव में काम होना चाहिए नही हो पा रहा। जंगल के अंदर रहने वाले आदिवासी@ दलित समाज इस बिमारी के िाकार है। गांव से अस्पताल की दूरी इतनी होती है कि मरीज वहां चल कर जा नही पाएगा। अवगमन का साधन आज भी कई गांव में नही हैं मानव के उपर और पाु- पक्षी जानवरों के उपर जिस तरह से हमला हो रहा हैं उससे बाजार की पंजी खेल हैं हमारी चीजे कैसे नष्ट हो इसकी चाहत ताकतवर देा चाहते है।
हर काम दूसरे के लिए करते मिडि़या बाजार के अनुरूप काम करती, ब्र्ड फुलू पिचम देाों के लिए काम रही है। भारत दुसरे देा के लिए काम कर रही हैं
हमारे यहां बाजार के अनुरूप मिडिया काम करती है। पिचम देाो के ढ़ाचाों को मजबूत करने का कार्य करती रही है। कुछ ऐसी बिमारियां है जिनका संबध दूषित पेयजल से है और जो प्रतिवर्ष लाखों करोड़ा मौता के लिए जिम्मेदार है। इस तरह की बीमारियों के लिए विदेाी पूंजी सहायता प्राप्त करना काफी कठिन है इन बीमारियों में मुख्य रूप से डायरिया, पेचिा टाइफाइड हैजा और टी.बी है मलेरिया सहित पानी से संबंधित कई बीमारियां प्रति वर्ष हजारों लोगो की जाने लेती है।
व्यापक स्तर पर देखे तो भारत के गांव @ाहर के हर व्यक्ति दूषित पेयजल का िाकार है। डायरिया से मरने वाला व्यक्ति भारत के गांव का होता है। कुष्ट रोग का िाकार भारत के ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते है। करोड़ो बच्चे और महिला कुपोषण के िाकार है। भुख से मरने वाले लोग भारत के गांव में है। जन स्वास्थ्य पर जो पैसा र्खच होता है। उसका 98 प्रतिात पैसा लोग खुद बहन करते है। गांवो में अस्पताल है। किन्तु वहां डाक्टर नहीं है। दवाईयां नही है। गांव के स्तर पर जो बिमारियां है। उसका इलाज ाहर या महानगरों में होता है। जिन बिमारियों का जिक्र कर रही हूं वह बिमारियां में अस्पताल के साथ - साथ डाक्टर और नर्स एवं विस्तर, अन्य अस्पताल की सुविधाएं होनी चाहिए वह नही है। बिमारी से पीडि़त लोग ाहर इलाज कराने आ जाने के क्रम मे कई लोगो की मौत हो जाती है जो बच गया वह आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो जाता कि वह अपनी स्थिति से लम्बे समय से उबर नही पाता वह अलात काफी मंहगा होता हैं। इस इलाज के लिए उन्हे खेत बंधक में रखना पड़ता है।
रांची के बुडमू ब्लाक के मरूपीड़ी गांव के सतेन्द्र यादव एक समाजिक कार्यकर्ता है के बहन के पति बबलू की मौत मस्तिष्क मलेरिया के होने से हो चुकी वह एक किसान परिवार का था उनके परिवार ने उसे मांडर के अस्पताल में भरती कराये किन्तु उस अस्पताल ने उसे राजेन्द्र मेडिकल अस्पताल भेज दिया जहां उचित इलाज के अभाव में मौत हो गयी। सतेन्द्र यादव बताते हैं मलेरिया के लिए सरकारी अस्पताल में कोई व्यवस्था नही। मलेरिया हो जाने पर जोडि़स या टाइफाइड हो जाते है मलेरिया के किटानू ख्ूान में होते है। जिससे लोगो के ारीर में खून की कमी हो जाती हैं सरकारी अस्पताल में खून की व्यवस्था नही हैं। मस्तिष्क मलेरिया में कीड़नी काम नही करने जिसके लिए डायनोसिस की व्यवस्था होनी चाहिए वह भी नहीं है। जब राजधानी से मात्र 30 कि0 मी0 की दुरी पर बना मांडर अस्पताल में जो छोटानापूर के पिचम क्षेत्र के गांव मुड़मा, माण्डर, बुडमू, ठाकूर गांव, चान्हों के लोग आते हैं। यह क्षेत्र आदिवासी और जंगल से घिरा है। अधिकंाा लोग किसान हैं। इलाज के लिए आते हैं छोटी बीमारी के लिए यह अस्पताल ठीक हैं लेकिन पूरा का पूरा झारखण्ड ही नही पूरा भारत इस मलेरिया बीमारी से ग्रसीत है। गांव माने गरीबी गरीबी माने मलेरिया गांव के लोग ऐसी स्थिति में जिनके पास पैसा है वह ाहर की ओर जाते है। गरीब व्यक्ति के पास पैसा नही होता है वह अपने जीवन से हाथ धो देते है। ऐसा ही कई हजार केस वहां है। सीबनी मुडमा की रहने वाली हैं उसे लगातार 3 बार मलेरिया से गुजरना पड़ा बार बार प्राइभेट डाक्टर से इलाज कराने के बाद भी उसे मलेरिया छोड़ नही रहा है।
वही स्थिति कुष्ट रोगी का हैं भारत सरकार कहती है कुष्ट रोगी भारत से समाप्त कर दिया गया है किन्तु रंाची के विधानसभा से मात्र 4 किलो मीटर के दूरी में बसा कुष्ट काॅलोनी अपनी बुनियादी सूविधाओं से दूर है। कुष्ट काॅलोनी के नाम पर मिट्टी के घर बना कर 500 परिवार रहते है। उन्हें कुष्ट काॅलोनी कह दिया गया हैं वहां ना लाइट हैं और ना किसी साफ सफाई की व्यवस्था कुष्ट रोगी के परिवार को 10 कि0 चावल सरकार की ओर से दिया जाता है वह चावल में कीड़े लग चुके होते हैं। उन्हें वे लेना नही पसंद करते हैं। वे लोग भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं।
कुछ दिनों तक गांव में धुमने के क्रम में हमने पाया कि जिस बिमारी से लोग मर रहे उसके प्रति सरकार और प्रेस दोनो संवेदन विहीन है। गरीब व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे अपनी जान दे कर ही उस बीमारी से मुक्ती मिलती है। मानव लम्बे समय से कई बीमारियों से आर्थिक रूप झेल रहा हैं। वही ब्र्ड फूलू के नाम पर हजार किस्से हमारे दुनिया में आ गयें।
