सोमवार, 29 सितंबर 2008
महिलाओं के लिए कानून बने है।
महिलाओं के लिए 40 कानून बने है। सत्ती प्रथा से लेकर दहेज हत्या, भ्रण हत्या, डायन हत्या, से लेकर घरेलू हिंसा पर कानून बन चुकी है। ध्यान देने योग बात यह है कि लम्बे से समय से आधी आबादी ने अपने अधिकार के लिए अपनी स्वतंत्रता के लिए जो आंदोलन घर के बारह छेडे वही आंदोलन घर के अंदर नही छड पाए हैं और अधिकार और स्वतंत्रता का जो दायरा कल था वह आ भी कायम हैं। कानून अचानक से इतने बन गये किन्तु सत्ता से लेकर उच्चे पदो पर आई जरूर हैं किन्तु वहां निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा गया हैं चाहे वह संसद से संडक, संडक से पंचायत तक और पंचायत से परिवार तक की स्थिति वही बनी रही सिर्फ शब्द बदल गये और आधी आबादी के चैखट को हिला दिया गया उसे नयी तकनीकी के साथ जोडे गये नही पूंजीवाद घर के आंगन तक उसे मानसिक और शरीरिक शोषण के लिए खडे मिलेंगे इस लिए अब लोगो का मामना हैं देश के अंदर चल रहे जितने भी स्त्री अधिकार के लिए बनाए गये कानून में महिलाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। सवाल यह उठता हैं कि घर में रहने वाली महिला जब यह कानून बनाने में योगदान नही दिया तब यह कानून किस काम कि है।
सरकारी स्कूल में बुनियादी जरूरत से बच्चे वंचित
अलोका रांची
भारत देश में सरकारी स्कूलों का भाग्य बदला नहीं जा रहा है। भाग्य को बदलने के लिए गुणवत्त "िाक्षा पर काम करने की जरूरत है। सरकारी स्कूलों के गिरतें स्तर से शक्षा के गुणकारी के स्तर का पता लगता है। सरकारी "िाक्षा के क्षेत्र में "िाक्षा को सुधारने का कोई प्रयास अब तक नहीं किया है। भारत गरीबों और मेहनतक"ा लोगों का दे"ा है। वह राज्य कृ'िा तथा जंगल प्रधान रहा है, सबसे अधिक गरीब जीवन बिताने वाले किसान, मज+दूर, आदिवासी तथा दलित लोग निवास करते है। जहां "िाक्षा नाममात्र या केवल दाखिला ही रह गया है। दाखिले का महत्वपूर्ण क्षेत्र सरकारी स्कूल ही रहें है। 80ः गरीब परिवारों के बच्चें सरकारी स्कूल में पढ़ते है। जिसमें आधे से अधिक बच्चे स्कूल आना पसंद नहीं करते है। कुछ बच्चे मध्यान भोजन के प्रचलन के कारण आते है। स्कूल न आने के कारण पता लगाने पर जानकारी मिली की उन बच्चों को स्कूल के "िाक्षक पंसन्द नहीं है। बच्चों को अंग्रेज+ी नहीं आती और "िाक्षक अंग्रेज+ी याद करने के लिए दे देते है। गणित की जानकारी मास्टर नहीं देते है। पढ़ाई में मन न लगने से किताबी चीज+ों को सही तरीकों से जान नही पाते है। मास्टर कहते है परीक्षा के समय में स्कूल ज+रूर आ जाना। बच्चों के किताबी ज्ञान को बढ़ाने के लिए मास्टर व मैडम पहल नहीं करते है। झारखंड के सुदूर गांव तथा जंगल के क्षेत्र के साथ - साथ "ाहर के सरकारी स्कूलों का स्थिति भी काफी खराब है। चुंकि झारखंड जंगल क्षेत्र में होने के कारण नक्सलियों का आ"िायाना है, जिस कारण जंगल के क्षेत्र के सरकारी स्कूल पर "िाक्षक नही आते। कई स्थानों में वहां के स्थनीय लोगों के सहयोग से स्कूल चल रहे है, लेकिन इन्हें सरकार के लोगों से मदद नहीं मिलती है। एक उदाहरण के तौर पर रांची के राजधानी से सटा तैभारा पंचायत के पानसकम गांव में नक्सलियों का डेरा होने के डर एक से पांचवीं कक्षा के स्कूल बंद पड़ गये है। जबकि कोड़दा गांव में अब मास्टर के नेतृत्व में ही स्कूल चल रहा है। सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम है कारण की स्कूल में बिजली, पानी, "ाौचालयों की सुविधा न होने के कारण छात्र पानी पीनें या "ाौचालय जाने के बहाने बाहर जाते है और क्लास रूम में वापस नहीं आते है। स्कूल में मनोरंजन के साधनों का अभाव है। ये अभाव बच्चों को स्कूलों से दूर कर रही है। स्कूल में पढ़ाई के अलावा अन्य गतिविधियों से बच्चों को नहीं जोड़ा जा रहा है। सरकार के एक भी स्कूल ऐसा नहीं है जिसे "िाक्षा के गणवत्ता का कारण पहचान किया जा सके। झारखण्ड के वेब साइड में सरकार ने खुद ही अपने द्वारा चलाए जा रहे स्कूल को अच्छी श्रेणी में नहीं बता पा रहें है। जबकि उनके वेब साइट में प्राइभेट स्कूल के कई नाम अच्छी श्रेणी में दर्ज किये गये। ब्रिटि"ा ज+माने में बनें हर जिला स्कूल अपनी गरीमा को दर्"ााता था। आज+ादी के 60 सालों बाद उस जिला स्कूल की स्थिति खस्ता बन गई है। इन स्कूलों की "िाक्षा की गुणवत्ता को जानबूझ कर कमज+ोर किया गया ताकि वहां पढ़ने आने वाले आदिवासी, दलित, गरीब, विधवा के बच्चों में प्रतिभा न आ सकें। ताकि वे उच्च ओहदे की नौकरी को प्राप्त करने के सक्षम न हो सकें। झारखंड के अलग राज्य होने के बाद स्कूली क्षेत्र में लड़कों और लड़कियों में भेद किया जा रहा है। लड़कियों को स्कूल में "ाामिल करने के लिए साइकिल उपहार के रूप में दिए जा रहें है। ताकि लड़किया स्कूली "िाक्षा से वंचित न हो सकें। सरकारी स्तर पर लड़कियों के साथ भेदभाव करने से, समाज में और सरकारी स्कूल में लड़कें व लड़कियों के "िाक्षा के साथ अंतर किया जाता है। इस प्रक्रिया से लड़कियां गुणकारी "िाक्षा से दूर है क्योंकि "िाक्षा का प्राच्य व्यवस्था को बिना बदले किसी लड़की को साइकिल दान देने से "िाक्षा की गुणवत्ता में परिवर्तन के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाएं जा रहें है। सरकार खुद जि+म्मेदारी "िाक्षा को कम करने में। झारखंड सरकार ने सरकारी स्कूल के बच्चों को फेल नहीं करने की घो'ाणा की है, साथ ही यह घो'ाण कर दी हैं कि जिस स्कूल में जिस कक्षा का बच्चा फेल करेगा असके टिचर को निलंबित कर दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में "िाक्षिकों के ऊपर दबाव बना कर पास करना ही है। ऐसी स्थिति में बच्चें को पढ़ाने और पाठयपुस्तक का अभ्यास लगातार नहीं करा पाते है। बच्चें को भी अपने पाठयपुस्तक के अभ्यास लगातार नहीं होने पर उनके दिमागी विकास सिमट कर रह जाती है। जिससे बच्चों में रचनात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। यही कारण है कि सरकारी स्कूल से निकलने वाले गरीब मां बाप के बच्चें दे"ा के उच्च पदों व स्थानों के अनुभव से वंचित रह जाते है और एक दो निकल भी गये ंतो उनका कार्य सफल नहीं माना जाता है।सुझाव - बच्चों का मानसिक विकास रचनात्मक कार्यों से होता है। वह स्वंय करेगा जब उसकी काम के प्रति लगन बढ़ेगी। इससे वह खुद को जोडेगा और आसमास के लोगों को भी जानेंगा। बच्चें का विकास स्कूल के विकास से जुड़ा हुआ है। बच्चें के विकास से गांव, समाज तथा समुदाय का विकास संभव है। "िाक्षा स्वास्थ्य, पानी बिजली के साथ तकनीकि क्षेत्र के ज्ञान को बच्चों तक पहुंचाया जाए। विज्ञान से संबधित प्रयोग "ाालाओं का निर्माण सरकारी स्कूल में बच्चों को जोड़ने के काम के साथ "िाक्षा को गुणकारी बना सकता है।
सोमवार, 22 सितंबर 2008
वरिष्ठ लेखिका प्रभा खेतान नहीं रहीं
कोलकाता. 20 सितंबर 2008
सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. प्रभा खेतान नहीं रहीं. 66 वर्षीय प्रभा खेतान ने कल देर रात कोलकाता में अंतिम सांस ली. दो दिन पहले ही उन्हें सांस में तकलीफ की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था. शुक्रवार को उनकी बाईपास सर्जरी की गई थी, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई.1 नवंबर 1942 को जन्मी प्रभा खेतान ने आओ पेपे घर चलें, पीली आंधी, अपरिचित उजाले, छिन्नमस्ता, बाजार बीच बाजार के खिलाफ, उपनिवेश में स्त्री जैसी रचनाओं से हिंदी जगत में अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाई थी.
सिमोन द बोउवा की पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ के अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ ने उन्हें स्त्री विमर्श की पैरोकार के तौर पर पहचान दी. कुछ समय पहले आई उनकी आत्मकथा 'अन्या से अनन्या' को लेकर भी हिंदी साहित्य में विमर्श का एक सिलसिला शुरु हुआ था.
कोलकाता के व्यवसायी जगत में भी प्रभा खेतान ने अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई थी। वे कोलकाता चेंबर ऑफ कामर्स की पहली महिला अध्यक्ष भी रही थीं.उनकी अंत्येष्टि रविवार को कोलकाता के नीमतल्ला घाट में संपन्न होगी.
साभार रविवार से
भारत में नारी मुक्ति आंदोलन का इतिहीस
आदिवासी समाज आदिवासी समाज भले सभ्य समाज के तथाकथित परिकृ’ट संस्कारों से लैस नहीं पर वहां स्त्री दासी नहीं है। प्रेम तथा विवाह करने अथवा बाहर जाकर खुद से खटने कमाने और स्वावलंबी बनने को स्वतंत्र है। वहीं कोई बच्चा हरामी नहीं माना जाता है। वहीं विवाह इतना जड़ नहीं है। वहीं रि”ता गति”ाील है वह बनता है - टूटता है - फिर जुड़ जाता है। यानि काफी सहज है। औरत की अपनी इच्छा भी इस व्यवस्था में रची बसी होती है। वै”वीकरण व बाज+ारवाद के चलते स्त्रियां वस्तु बनती जा रही है। इस पर कुछ दूर तक सहमत करते हुए वे कब वस्तु नहीं थी, वे तो घर परिवार और समाज की नज+रों में वस्तु ही थी। वे खुद को वस्तु की ही तरह पति व तरिवार के लिए सजती संवरती थी। आज घर का दायरा टूटकर बाज+ार तक पहुंच गया है। पहले भी ये दरबारों, भक्त मंण्डलियों या साधु संतों तक जाता था। कौन नहीं जानता की राजा - महराजा स्त्रियों को वि’ाकन्या बनाकर दूसरे राज्यों में भेजकर राजाओं की हत्या करवाते थे। इन्द्र ने मेनका का उपयोग वि”वामित्र का तप भंग करने के लिए किया था। आखिर क्या समझकर एक सुंदरी को हथियार या औज+ार माना गया? इन सब के बावजूद इन स्त्रियों को न समाज ने, न इतिहास ने योद्धा माना और न ही “ाहीद कहा उनकी विरूद्ध बालियां भी नहीं गायी गयी। अनेक मिथक इसके साक्षी है कि भारतीय मानस में स्त्री सदैव एक वस्तु ही रही, चाहे घर हो, धर्म या सत्ता के गलियारे या बाज+ारों के कोठे। बल्कि आज स्त्री खुद को मनु’य मानने और मनवाने की मुहिम में सक्रिय हुई है। जहां बाज+ार व वै”वीकरण उसे विज्ञापन तो बना रहा है पर वही वह वै”वीकरण उसे वि”व के पैमाने पर एक सूत्र में जोड़कर स्त्री को स्त्री के नाते अस्मिता मजबूत करने का अवसर भी दे रहा है। झारखंड के आदिवासी समाज में स्त्री को हल जोतने की मनाही है। अगर वह हल जोत ले तो दंडस्वरूप बैल की तरह उसी को बैल बनाकर भूसा खिलाया जाता है और कंधे पर हल डालकर उससे खेत जुतवाया जाता है। इसी प्रकार छत (घर का छपर छाने) डाल लेने पर स्त्री का मुंह काला करके, सिर मुंडवाकर पूरे गांव में घुमाया जाता है। स्त्री को धनु’ा छूने का भी अधिकार नही है। हालांकि महेतास में जब - जब आदिवासी पुरू’ा पीकर बेहो”ा थे तो औरतों ने धनु’ा चलाया और तीन बार मुगल आक्रमणकारियों को परास्त किया था।
रविवार, 21 सितंबर 2008
सफदर समूह का काम
पंचायत चुनावों में महिलाओं
aloka
देश में सम्पन्न हुए पंचायत चुनावों में महिलाओं ने जिस तरह पर्दा और चहारदीवारी से निकल कर बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाई है उससे यह तो साबित ही हो गया है कि महिलाएं भी अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई हैं, उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है और नए साहस से लवरेज नजर आने लगी हैं। उनमें अपार ऊर्जा का संचार हुआ है। पंचायत चुनावों में चयनित महिलाएं अब पुरुषों पर निर्भर नहीं रहना चाहती हैं। वे आत्मविश्वास के साथ अपने सभी कामों को स्वयं अपने बलबूते पर करना चाहती हैं। साथ ही वे अपने काम का आकलन भी जरूरी समझती हैं। आरक्षण की बिना पर ही महिलाएं पंचायत चुनावों में नए कीर्तिमान के साथ उभर कर आई हैं। यद्यपि प्रत्येक चुनाव की तरह ही इन चुनावों में भी धन की भूमिका काफी अहम रही फिर भी पैसे के अभाव में भी चुनाव जीतने के कीर्तिमान स्थापित हुए हैं। बिहार के कटिहार जिले के बलरामपुर ब्लाॅक में कीरोरा पंचायत में एक भिखारिन हलीमा खातून मुखिया निर्वाचित हो गई हैं। इसी प्रकार पूर्णिया जिले में भी चाय का ठेला लगाने वाली शांति देवी भी पंचायत सदस्य चुनी गई हैं।
पंचायत चुनावों में नवनिर्वाचित महिलाएं यद्यपि पूरी तरह से उर्जान्वित हैं अब देखना यह है कि रचनात्मक रूप में इस ऊर्जा का किस हद तक उपयोग हो पाता है; क्योंकि क्षेत्र पंचायत में काम करने के दौरान नई-नई कठिनाईयों एवं बाधाओं से जूझना पड़ेगा, और वे उन कठिनाइयों और बाधाओं से जूझने में किस हद तक सफल हो पाएंगी। और फिर उन हालातों में जब पंचायत चुनावों में निर्वाचित होकर जन सेवा करने का भाव गायब होता जा रहा हो और चैधराहट दिखाने की भावना बल पकड़ती जा रही हो।
ग्राम पंचायतों में ग्राम प्रधानों व सेक्रेेटरियों की पौ-बारह है। ग्राम पंचायतों में हो रही धांधलियों पर शिकायत के बावजूद मिलीभगत के चलते प्रशासन द्वारा कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जिसकी वजह से ग्राम प्रधान सेक्रेटरी के साथ मिल कर अपनी मनमानी कर रहे हैं। देश की तमाम ग्राम पंचायतों से विधवा पेंशन, रोजगार गारंटी योजना के जाॅबकार्ड, मिड-डे मील वितरण तथा बीपीएल राशनकार्ड बनाने के तौरतरीकों में हो रही धांधलियों की शिकायत आने के बावजूद उनके निस्तारण पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कुछ ऐसे संकेत मिले हैं कि तमाम जगह तो दंबगई और चैधराहट के चलते ग्राम प्रधान और सेक्रेटरियों की शिकायत करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हैं। अगर कोई शिकायत करता भी है तो उनकी शिकायत को तरजीह देने के बजाय टरकाऊ लहजे से टाल दिया जाता है।
आज हमारा समाज एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। लगभग 61 वर्’ाों के “ाांत सुगम परिवर्तन की प्रक्रिया के बाद महिलाओं को अपने गांव की पंचायत में मजबूती से खड़ा होने का मौका मिला है। जिससे समाज में गुणवत्ता परिवर्तन आया है। भारत के एक दो राज्य के छोड़ कर लगभग सभी राज्यों के पंचायतों में महिलाओं की भूमिका मजबूती के साथ बनती जा रही है। जिससे गांव के अन्दर स्वास्थ्य और ”िाक्षा में मजबूती से काम चल रहा है। जहां-जहां महिला पंचायत के रूप में चुनाव जीत कर आई, उस गांव के परिदृ”य बदलने लगा। हर गांव में सही क्षा का सवाल प्रमुखता से लिया जाने लगा है। समाज कल्याण, परिवार कल्याण और जन-स्वास्थ्य पर पंचायत जिम्मेवारी लेने लगी है।
शनिवार, 20 सितंबर 2008
एक और महिला संगठन बनाना जरूरी क्यों ?
महिलाओं को आधार बना कर अनेकों संगठन पहले से हैं किन्तु उन संगठनों को महिलाओं ने अपनी आव’यकता को देख कर नहीं बनाया बल्कि दुसरे संगठन में एक विग के रूप में महिलाओं का होना तय किया गया। आज तक भारत में जितने भी महिला संगठन हैं वह किसी न किसी संगठन के अधीन बना है। अधिन वाली स्थिति लगातार बनी हुई है। महिलाओं को कभी भी एक वर्ग के रूप में नहीं देखा गया है। अब तक के भारतीय समाज में औरतों के लिए जो ढांचा समाज ने बनाया है महिलाएं उसके अधिन हैं। हमारे समाज का ढांचा पूर्व में सामंती अर्थव्यवस्था आधारित था और अब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था आधारित हैं. क्योंकि इस व्यवस्था की वैचारिक स्थिति भी होती हैै जो समाज के व्यक्ति को उस व्यवस्था के लायक बनाता है। जिसके कारण पुरूषों की तरह इस समाजिक ढांचा में महिलायें भी रहने की आदि हो गयी हैं। लम्बे समय से अधिन रहने कि प्रक्रिया में नये संगठन को बनाना और उसके रूप-स्वरूप पर विचार करना महत्वपूर्ण है। हर बार नये संगठन बनते और कमजोर होते रहें हैं, इस पर विचार करने की जरूरत है। महिला संगठन या आंदोलन के कमजोर होने के मूल कारण जो हमारे सामने स्पष्ट हैं वह है वर्ग के बाहर अब तक महिलाओं को देखा गया है, महिलाओं को अस्मिता के रूप में देखा गया है। जबकि सही तरीके से देखें तो हमारे समाज में उत्पादन और उत्पादन के संबध के साथ जुडे हुए समाज में लैगिक भेद हैं। समाज में उत्पादन में दो तरह के संबध है। 1. उत्पादन के साधन का मलिक होना और 2. उत्पादन के साधनों के मलिकों द्वारा ’ाोषित होना, जिनके श्रम को खरीदा जाता है, यानि मेहनतक’ा। इस आधार पर औरत कहीं भी उत्पादन के साधन की मलिक नहीं है(एक दृष्टि है)। भारतीय समाज में जातिय संरचना है जहां उत्पादन के साधन से महिला से वंचित है। उत्पादन के साधन हंै-जमीन, म’ाीन, फैक्ट्री, आदि। समाज में दो तरह के उत्पादन है -ः 1. अतिरिक्त ( बे’ा) मूल्यः मानव श्रम ’ाक्ति से अतिरिक्त ( बे’ा) मूल्य पैदा होता है। जिससे पूंजीपतियों का विकास होता है। पूंजीवादी संबधांे का विकास होता है और‘’ाोषण की व्यापकता होती जाती है। 2. पूर्णउत्पादन ;तमचतवकनबजपवदद्धरू एक मजदूर अपने औरत के साथ एक मजदूर पैदा करता है। इस हिसाब से समाज, राज्य, राष्ट्र में वह सबसे नीचले पायदान पर है, एक निचले तबके की है और पूंजीवादी समाज में सबसे नीचला तबका श्रम करने वालों का होता है। पंूजीवादी विचार के खिलाफ क्रांतिकारी विचार के आधार पर संगठन न तो बनाने दिया जाता है और न हीं बनाया जाता है। आज तक जितने भी संगठन बने हंै एकल आधार पर ही बनता है- जाति, लैंगिक, मजदूर, आदि का संगठन बनता है। समग्र रूप से देखंे तो महिला आंदोलन एकलवादी आंदोलन है। वर्ग के आधार पर कभी संगठन नहीं बना है। महिला संगठन लैंगिक आधार पर बनता है वर्ग के आधार पर नहीं बनाया जाता है। यदि वर्ग के आधार पर संगठन बनाते, तब आजादी के 60 सालों में महिलाओं की राजनीतिक पार्टियों में महत्वपूर्ण भूमिका होती और महिलाएं नेतृत्व में बहुतायत की संख्या में होती।महिलाओं के लैंगिक-दैहिक ’ाोषण सामंती-पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था के कारण है। यूरोप के दे’ाों में पढ़ी-लिखी औरतों ने अपना संगठन बनाया, जिसमें महत्वपूर्ण नेता ‘सिमाॅन दी वाॅ’ ने भी नहीं समझीं और वह भी लैंगिक आधार पर संगठन बनाती रहीं। उन्होंने इस बात पर घ्यान नहीं दिया। उनकी पुस्तक दी सेकेण्ड सेक्स में उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कहा है कि वे पुरूषांे के अधिन हैं। लेकिन समाज मुक्ति-आन्दोलन के लिए किसी आन्दोलन व संगठन को लैंगिक आधार पर आदमी और औरत में बांटा नहीं जा सकता। इससे समाज के मुक्ति-आन्दोलन के संघर्ष को आगे बढ़ाया नहीं जा सकता और मुक्ति-संघर्ष को उच्च स्तर पर नहीं पहुंचाया जा सकता है। यूरोप में औरतों के आन्दोलन औरतों पर आधारित पुस्तकों, फिल्मों, संगीत की ओर जाने वाला दृष्टिकोण या फिर मोटे तौर पर सांस्कृतिक आधार पर ही रह गये। ‘सिमोन’ कोई छोटी-मोटी बुद्विजीवी नहीं थीं। लेकिन अपने मध्यवर्ग स्थिति के कारण अपने किताब में वर्ग की बात नहीं की। भारत में महिलाओं को जात के आधार पर बांट दिया गया (सबसे निचले स्तर के जातियों के परिवारों में महिलाएं ’ाोषत होती है) । आज तक जितने भी महिला संगठन हैं वह किसी न किसी राजनीति पार्टी के अधिन ही रही हैं। उसका अपना स्वतंत्र समूह बनने नहीं दिया गया है जो अपने वर्ग ‘ मेहनतकश वर्ग ’ के साथ जुड़ कर अपने मुक्ति के संघर्ष को उच्च स्तर पर पहुंचा कर शोषण के इस व्यवस्था को समाप्त करके एक शोषण -मुक्त व्यवस्था बना सके।
शुक्रवार, 22 अगस्त 2008
सोमवार, 18 अगस्त 2008
झारखण्ड की पहली पडहा राजा मुक्ता होरों
अलोका
एन.एफ. आई और ए. आई एफ के तहत फेलोसिप के तहत शोध
झारखण्ड मे पंचायत चुनाव न होने से वहां पंचायती राज व्यवस्था का अस्तित्व खतरे में है। जहां पूरानी परंपरागत स्व’ाासन व्यवस्था की एक मजबूत कड़ी का नाम पड़हा व्यवस्था है। इस व्यवस्था के द्वारा मुक्ता होरो ने अपने जनस्वश्स्छ असं व्यवस्था के अन्तगर्त कई काम करते आ रही है। 14 गांव धीरे -धीरे विकास की प्रगति के पथ पर अग्रसर है। वही गांव से पूरे दुनिया को संदे’ा के रूप में राजधानी रांची से नजदीक बुण्डू ब्लाॅक के पानसकम गांव की महिला मुक्ता होरो लोकतंात्रिक प्रणाली की उपज है।
झारखण्ड की विभिन्न आदिवासी समुदायों के बीच आज भी अलग- अलग परम्परागत स्वा’ाासन व्यवस्था अस्तित्व में है। इन्हीं व्यवस्थाओं में पड़हा व्यवस्था प्रमुख है। 14 गांवो को मिला कर पड़हा का गठन किया जाता है। यानि हर गांव के ग्राम प्रधान को मिला कर पड़हा का चुनाव होता है। यह व्यवस्था मूलतः आदिवासी क्षेत्रों में होता है। पड़हा राजा पद पर वर्षो से पुरूषों का सत्ता कायम की है। किन्तु अब इस पद पर महिलाएं भी चुन कर आ रही है परम्परागत व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक बनाने की दि’ाा में सकारात्मक है। पड़ाह सभा में प्रत्येक गांव के प्रत्येक पंचायत से दो लोग प्रतिनिधि ‘’ामिल होते है। गांव सभा सहमति के आधार पर प्रतिनिधियों का चयन करती है। उनका कार्यकाल 6 साल का होता है। परन्तु हर साल के ‘’ाुक्र में प्रत्येक प्रतिनिधि गांव सभा के सलाना सभा या जलसे के सामने अपने कार्य का व्यौरा रखते है।उसके आधार पर गांव सभा फैसला लेती है। सलाना जलसे में या बीच में किसी भी समय गांव सभा का विस्तार करने की हालत में संबंधित व्यक्ति की सदस्यता अपने- आप समाप्त मानी जाती हैं जहां क इस व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी का सवाल है। तैमारा पंचायत में महिलाओं को एक तिहाई बहुमत 12 साल पहले से प्राप्त है। वहां पड़हा राजा द्वारा खुले रूप से लोकतंत्र के सिद्वांतों का सम्मान किया जाता है। मुक्ता होरों के नेतृत्व वाले पड़हा सभा में गांव की समस्या सड़क, पानी जंगल, ’िाक्षा, स्वास्थ्य, विवाह, बाजार तथा युवा - युवतियों की समस्याओं पर चर्चा कर उनके समाधान व विकल्पों की जला’ा की जाती है। इसके अन्तगर्त तैमारा पंचायत के अन्तगर्त सभी गंाव कोनेगा, मुनीडीह, हुसरीहातू, लबगा, कोड़दा, हाॅंजेद, बेड़ा, पानसकम, आडाडीह, लोआहातू, तैमारा, और अन्य गांव है। इन गांव की कुल आबादी लगभग 16 हजार से अधिक है। इस पदर पर 5 सालों से कार्यरत्त मुक्ता होरो ने बताया कि ’िाक्षा के प्रति गांव वाले ज्यादा सचेत है। हर गांव में एक सरकारी स्कूल हे जिसमें सातवी कलास तक की पढ़ाई होती है। हर गांव का लगभग हर बच्चा स्कुुल जाता है। यदि एक बच्चा सप्ताह भर स्कूल नहीं जाने पर गांव में बैइक हो जाती है। गांव में मैट्रिक की पढ़ाई के बाद बुण्डू काॅलेज जाते है। आवगमन का साधन नही करने के कारण काॅलेज की पढ़ाई में कम लोग जाते है। पढ़ाई के बाद सरकारी नौकरी की आ’ाा है। खेती का स्थान पहले से ही बना हुआ है। जंगल की रक्षा प्रमुख रूप सेे किए जा रहे है। यह पूरा गांव मूख्यतः खेती और जंगल पर आधारित है। पहले की अपेक्षा जंगल की स्थिति में परिवत्र्तन आई है। अतः जंगल बचाने के लिए वि’ोष जोर दिया जा रहा है। जंगल के फल- फुल पत्ती, डाल, जड़ी, बुटी का उपयोग अपने जीवन में करते हैं। गांव की एक महिला बीड़ा मुण्डा ने कही जंगल का घनत्व कम हुआ है। लेकिन यदि इसे बचाया जाएगा तब हम पुर्णः पुराने जंगल की प्राप्ती कर सकते है। तैमारा के ग्रामीण तारालाल सिंह मुण्डा ने कहते हे। गांव सभा ने पड़हा राजा महिला को बनाने से गांव समाज में साकारत्मक परिवत्र्तन आया है। महिला महत्वपूर्ण पद पर आकर निर्णय लेती हे तब चुल्हा चैका से लेकर खेती- बारी और समाज के सभी लोग मूल रूप् से घ्यान दिया जाता है। उनके अनुसार स्वच्छ और स्वस्थ्य परिवार ही समाज के नव निर्माण में भाग ले सकता है। वह गांव में सरकारी योजना से लोगा लाभ नहीं उठा पा रहें हैं। गांव में एकता के बल पर ज्ञान और जानकारी बांट रहे है। दीप थोड़ा ही सही जलाने ने की को’िा’ा की जा रही है।
झारखंड इन्साइक्लोपीडिया
झारखण्ड के ’वेत - ’याम तस्वीर को अपनी सीमाओं के साथ ‘झारखण्ड इन्साइक्लोपीडिया ’ में प्रस्तुत किया गया है। इस इन्साइक्लोपीडिया के बारे में दो बाते अलग से घ्यान दिये जाने योग्य है। पहला सम्मावतः किसी राज्य का यह पहला इन्साइक्लापीडिया है और दूसरा, यह काम सरकारी संस्था के द्वारा न किया जाकर एक सरोकारों वाले प्र’ाासनिक अधिकारी के द्वारा किया गया है। झारखण्ड इन्साइक्लोपीडिया के चार खंडों में कुल 122 लेख संकलित हें जो कुल 1564 पृष्ठों पर फैले है।
बुधवार, 13 अगस्त 2008
बर्ड फुलू से ज्यादा मलेरिया से होती हैं मौत
अलोका
एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलोिाप के तहत
झारखण्ड में ब्र्ड फूलू 2007, मलेरिया हर साल -ः पूरे देा में मुर्गी - मुगी मारने का आदेा आ गया में ब्र्ड फुलू बीमारी भारत के उन गांव तक पहुंच गयी जहां तक विदेाी कम्पनी अपना पैर पसार रही है। यह ऐसी बीमारी है जिससे ग्रामीण क्षेत्र के मुरगे - मुरगी, बत्तख की बिमारी से ज्यादा गांव की परम्परागत लघु उद्योग को समाप्त करने की कोिाा है। यह बिमारी से ग्रसीत इलाका भारत का आदिवासी गांव होते है। जहां किसान कें परिवार छोटे मात्रा में पाु- पक्षी को घन के रूप में पालते है। मलेरिया भारत के गांव और ाहर तमाम स्थानों में फैली हुई है। हर साल मलेरिया से मरने वाले लोगो की संख्या हजारों- हजार है।
यह उस परिवार के लिए छोटा आय को स्रोत रहा है। पूरा का पूरा भारत के गांव में पशु- पक्षी पालने की अपनी अलग परम्परा रही है। मुरगे- मुरगी, भोजन में खाने की पद्वित भी आदिवासी गांव का ही रिवाज रहा। वक्त बदलने के साथ-साथ अन्य समाज के लोगो की पसंदीदा भोजन में मुरगे - मुरगी, खाने का प्रचलन काफी बढ़ गया और वह एक बड़े बाजार mane तबदील होते चले गये यही नही विव स्तर पर यह भोजन (चिकन खाने वाले की संख्या में इजाफा हुआ) प्रचलित हो गये जिससे बाजार में मांग के साथ- साथ व्यवसाय भी बन गये।
जहां- जहां बड़ा बाजार पहुचा वहां- वहां भारी संख्या में गरीबों के लधु उद्योग को धक्का लगा वक्त के साथ भोजन के अन्दाज बदले और यह बाजार व्यापक रूप में सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में फैल गया। चिकन खाने वाले की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। किन्तु अपने परम्परागत पाु- पक्षी की परम्परा में थोड़ा बदलाव आया गांव में मुर्गी पालन को पहले के अपेक्षा ज्यादा हुई हैं किन्तु उसकी बड़ी बाजार गांव के हाट होते हैं इस हाट परम्परागत मुर्गे मुर्गीयां बेचे जाती थी। धीरे- धीरे यह बाजार में देाी मुर्गी के स्थान पर बॅायेलर ने जगह लेना ाुरू ही नही किया बल्कि उसे देाी बाजार उच्ची दाम पर मुर्गे बेचे जाने लगी। और देाी बाजार पर कब्जा होता चला गया। बडे बाजार ने गांव की आर्थिक व्यवस्था को काफी धका पहुंचाया। गांव के इस पाुधन के सामने आर्थिक संकट को देखते हुए मिडिया ने इस ब्र्ड फुलू बीमारी का जबर्दस्त कवरेज दिया। पूरे देा में मुर्गी मारने की खबर अखबारों टी बी में लगातार आने लगे लाखों करोड़ मुर्गी को मार डाला गया। जंगल के किनारे बसे गांव के मुर्गे- मुर्गी को मार कर खतम करने की कोिाा की गयी ताकि एक भी परम्परागत मुर्गीयां ना रहे।
गांव में धुमने के क्रम में देखे कि गांव में मुर्गो की बांग नही हो रही हैं कारण पुछने पर पता चला कि गांव के सभी मुर्गी को मार दिया गया हैं। वन गांव के निवासी मणि सिंह मुण्डा ने बताया कि इस बिमारी से मुर्गी मार कर गांव की अर्थ व्यवस्था को तोड दिया गया, उन्होंने बताया कि ब्र्ड फुलू आज से 60 साल पहले नही थी। आदिवासी क्षेत्रो में इस तरह कि बीमारियां नही थी अचानक से को बिमारी उत्पन्न कर गांव के सारे पक्षी को मार डालने की साजिा है। हमारे समाज में सामुहिकता का जीवन जीते है। पाु- पक्षी भी हमारे कष्ट के दिनों में सहयोगी होते है। अचानक जिस बीमारी का परकोप हमारे गांव में पड़ा उससे लगता है कि अब पैकेट में बंद कर खाना आ रहा जिससे हमारे परम्परागत भोजन को समाप्त करने की योजना है। हमारे यहां गांव में छोटे - छोटे स्थानिय बाजार होते है। मानव आवयकता के चीजे अपने क्षमता के अनुसार अपने घर में रखते है। उसे समाप्त कर पचात देाो के पाु- पक्षी का बाजार फैलाने की जो योजना चल रही। इसका सबसे बड़ा कारण है ब्र्ड फुलू पुरखा के समय में मुर्गी नही मारा जाता था। आज बाजार इतनी हावी हो गये है कि हमारी स्थानिय बाजार को समाप्त कर हमें पंगु बना देना चाहते है। आज भी भारत का गांव अपने श्रम और अपने परम्परागत चीजों के साथ जीवित है। अन्तराष्ट्रीय बाजार की अफवाह में की मार यदि कोई उठाता है तो वह हैं ग्रामीण लोक अर्थव्यवस्था
अड़की के पंचायत के पड़ाह राजा, और समाजिक कार्यकत्र्र्ता पौलूस हेम्बम ने बताया कि हमारे देा में ब्र्ड फुलू से भी खतरनाक बीमारी मलेरिया है। आज तक हमारे गांव से ब्र्ड फुलू बीमारी से एक व्यक्ति की भी मौत नहीं हुई है। जबकि मलेरिया से लाखों लोगो की जान जा चुकी है। इस मौत की खबर अखबार में स्थानिय स्तर पर आते है। मलेरिया को लेकर पूरे देा का अखबार कभी नही लिखे। जबकि ब्र्ड फुलू बीमारी बाजार के साथ जुड़ी है। जिस कारण इसे पूरे देा के मीडिया ने स्थान दिया। मलेरिया को लेकर जिस तरीके से गांव में काम होना चाहिए नही हो पा रहा। जंगल के अंदर रहने वाले आदिवासी@ दलित समाज इस बिमारी के िाकार है। गांव से अस्पताल की दूरी इतनी होती है कि मरीज वहां चल कर जा नही पाएगा। अवगमन का साधन आज भी कई गांव में नही हैं मानव के उपर और पाु- पक्षी जानवरों के उपर जिस तरह से हमला हो रहा हैं उससे बाजार की पंजी खेल हैं हमारी चीजे कैसे नष्ट हो इसकी चाहत ताकतवर देा चाहते है।
हर काम दूसरे के लिए करते मिडि़या बाजार के अनुरूप काम करती, ब्र्ड फुलू पिचम देाों के लिए काम रही है। भारत दुसरे देा के लिए काम कर रही हैं
हमारे यहां बाजार के अनुरूप मिडिया काम करती है। पिचम देाो के ढ़ाचाों को मजबूत करने का कार्य करती रही है। कुछ ऐसी बिमारियां है जिनका संबध दूषित पेयजल से है और जो प्रतिवर्ष लाखों करोड़ा मौता के लिए जिम्मेदार है। इस तरह की बीमारियों के लिए विदेाी पूंजी सहायता प्राप्त करना काफी कठिन है इन बीमारियों में मुख्य रूप से डायरिया, पेचिा टाइफाइड हैजा और टी.बी है मलेरिया सहित पानी से संबंधित कई बीमारियां प्रति वर्ष हजारों लोगो की जाने लेती है।
व्यापक स्तर पर देखे तो भारत के गांव @ाहर के हर व्यक्ति दूषित पेयजल का िाकार है। डायरिया से मरने वाला व्यक्ति भारत के गांव का होता है। कुष्ट रोग का िाकार भारत के ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते है। करोड़ो बच्चे और महिला कुपोषण के िाकार है। भुख से मरने वाले लोग भारत के गांव में है। जन स्वास्थ्य पर जो पैसा र्खच होता है। उसका 98 प्रतिात पैसा लोग खुद बहन करते है। गांवो में अस्पताल है। किन्तु वहां डाक्टर नहीं है। दवाईयां नही है। गांव के स्तर पर जो बिमारियां है। उसका इलाज ाहर या महानगरों में होता है। जिन बिमारियों का जिक्र कर रही हूं वह बिमारियां में अस्पताल के साथ - साथ डाक्टर और नर्स एवं विस्तर, अन्य अस्पताल की सुविधाएं होनी चाहिए वह नही है। बिमारी से पीडि़त लोग ाहर इलाज कराने आ जाने के क्रम मे कई लोगो की मौत हो जाती है जो बच गया वह आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो जाता कि वह अपनी स्थिति से लम्बे समय से उबर नही पाता वह अलात काफी मंहगा होता हैं। इस इलाज के लिए उन्हे खेत बंधक में रखना पड़ता है।
रांची के बुडमू ब्लाक के मरूपीड़ी गांव के सतेन्द्र यादव एक समाजिक कार्यकर्ता है के बहन के पति बबलू की मौत मस्तिष्क मलेरिया के होने से हो चुकी वह एक किसान परिवार का था उनके परिवार ने उसे मांडर के अस्पताल में भरती कराये किन्तु उस अस्पताल ने उसे राजेन्द्र मेडिकल अस्पताल भेज दिया जहां उचित इलाज के अभाव में मौत हो गयी। सतेन्द्र यादव बताते हैं मलेरिया के लिए सरकारी अस्पताल में कोई व्यवस्था नही। मलेरिया हो जाने पर जोडि़स या टाइफाइड हो जाते है मलेरिया के किटानू ख्ूान में होते है। जिससे लोगो के ारीर में खून की कमी हो जाती हैं सरकारी अस्पताल में खून की व्यवस्था नही हैं। मस्तिष्क मलेरिया में कीड़नी काम नही करने जिसके लिए डायनोसिस की व्यवस्था होनी चाहिए वह भी नहीं है। जब राजधानी से मात्र 30 कि0 मी0 की दुरी पर बना मांडर अस्पताल में जो छोटानापूर के पिचम क्षेत्र के गांव मुड़मा, माण्डर, बुडमू, ठाकूर गांव, चान्हों के लोग आते हैं। यह क्षेत्र आदिवासी और जंगल से घिरा है। अधिकंाा लोग किसान हैं। इलाज के लिए आते हैं छोटी बीमारी के लिए यह अस्पताल ठीक हैं लेकिन पूरा का पूरा झारखण्ड ही नही पूरा भारत इस मलेरिया बीमारी से ग्रसीत है। गांव माने गरीबी गरीबी माने मलेरिया गांव के लोग ऐसी स्थिति में जिनके पास पैसा है वह ाहर की ओर जाते है। गरीब व्यक्ति के पास पैसा नही होता है वह अपने जीवन से हाथ धो देते है। ऐसा ही कई हजार केस वहां है। सीबनी मुडमा की रहने वाली हैं उसे लगातार 3 बार मलेरिया से गुजरना पड़ा बार बार प्राइभेट डाक्टर से इलाज कराने के बाद भी उसे मलेरिया छोड़ नही रहा है।
वही स्थिति कुष्ट रोगी का हैं भारत सरकार कहती है कुष्ट रोगी भारत से समाप्त कर दिया गया है किन्तु रंाची के विधानसभा से मात्र 4 किलो मीटर के दूरी में बसा कुष्ट काॅलोनी अपनी बुनियादी सूविधाओं से दूर है। कुष्ट काॅलोनी के नाम पर मिट्टी के घर बना कर 500 परिवार रहते है। उन्हें कुष्ट काॅलोनी कह दिया गया हैं वहां ना लाइट हैं और ना किसी साफ सफाई की व्यवस्था कुष्ट रोगी के परिवार को 10 कि0 चावल सरकार की ओर से दिया जाता है वह चावल में कीड़े लग चुके होते हैं। उन्हें वे लेना नही पसंद करते हैं। वे लोग भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं।
कुछ दिनों तक गांव में धुमने के क्रम में हमने पाया कि जिस बिमारी से लोग मर रहे उसके प्रति सरकार और प्रेस दोनो संवेदन विहीन है। गरीब व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे अपनी जान दे कर ही उस बीमारी से मुक्ती मिलती है। मानव लम्बे समय से कई बीमारियों से आर्थिक रूप झेल रहा हैं। वही ब्र्ड फूलू के नाम पर हजार किस्से हमारे दुनिया में आ गयें।
बुधवार, 6 अगस्त 2008
नरेगा कानून और बेरोजगारी भत्ता (एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलो’िाप के तहत )
झारखण्ड राज्य के अन्तर्गत हजारीबाग जिले के कटकम सांडी प्रखण्ड के लोग लगातार नवम्बर 2007 से नरेगा कानून के अन्तर्गत बेरोजगारी भत्ते की मांग कर रहे है। 04.02 .06 को जाॅब कार्ड दिया गया परन्तु उस जाॅब कार्ड में काम नहीं दिया गया है। कटकमसांडी के महिला पुरूष एवं गांव के तमाम लोगो ने उपायुक्त कार्यालय हजारीबाग में घरना दे कर बेरोजगारी भत्ते की मांग कर रहे है।
पूरी व्यवस्था इतनी अनसूनी हो गयी है कि बार-बार आवाज लगाने के बावजूद मजदूरों के साथ अन्याय रूक नही पाता है। नरेगा कानून के तहत फिर एक बार इस नये बेरोजगारी दूर करने के नाम पर 300 मजदूर नरेगा के तहत काम मांग रहे है। इस 300 मजदूर ने काम का आवेदन 2007 मे ही किये थे लेकिन गांव के लोगो को न काम मिला और न बेरोजगारी भत्ता फिर एक बार सरकार ने मजूदरों को अपने अधिकार देने से वंचित करता नजर आ रहे है। कानून का पालन नहीं हो पा रहा है जब सरकारी पदाधिकारी कानून का पालन नही कर सकते तब आम जनता से क्यों उम्मीद करते है?
झारखण्ड प्रदे’ा मूलतः आदिवासी दलित का क्षेत्र रहा है यहां श्रम की पूजा और अपने श्रम पर वि’वास करते है विगत 15 सालों में झारखण्ड के जल - जंगल और जमीन पर विदे’ाी कम्पनी के नि’ाानें पर है जंगल पानी के अभाव में पन्नप नही रहे है जिससे वायू प्रदूषण तेज होता जा रहा है पूराने बचे हुए जंगल पर व्यापारियों का कब्जा होता चला जा रहा है। वही जीमन के उत्पादन के घटने से भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जा रहीं है। उत्पादन का कम होना बेरोजगारी को बढ़ावा देते चले जा रहे है इस बेरोजगारी पलायन को बढ़ाव देती चली जा रही है। लेकिन बचे हुए कुछ गांव अपने श्रम के बल पर आज भी जीवित हैं। उस गांव में रहने वाले लोग आज भी बेरोजगारी है काम पाना चाहते है। नरेगा कानून उन किसानों के लिए खरा नही उतर पा रहा है जिनके किसानों के लिए रिन माफ करने का वादा किया हो।
गरीब सरकारी प्रक्रिया में लम्बे समय तक जुझता है। आखिर में तंग आकर पलायन करने की सोचते है। गरीबों के नाम पर बनने वाले कानून से गरीब लाभ नही उठा पा रहे है। जबकि अपने अधिकार को लागू करने उस अधिकार को पाने के लिए लम्बे समय से संघर्ष करना पड़ता है। जैसा की झारखण्ड के हजारीबाग मे हो रहे है। सरकार उन्हें न रोजगार मुहैया करा पा रही और न बेरोजगारी भत्ता ही दे पा रही है। बेरोजगारी भत्ते के मांग के लिए कटकमसांडी के गांव के लोग लगातार उपायुक्त कार्यालय के सामने घरना दे रहे है।
बेरोजगारी भत्ता पाने वाले चिन्तामन राम ने बताय कि हमारा अधिकां’ा समय सरकार के बनाए कार्यालय में घुमते - घुमते बीत जाता है वहीं सरकार की तमाम प्रक्रिया और विकास संबधी योजना प्रखण्ड कार्यालय आती है। प्रखण्ड कार्यालय के प्रधान पदाधिकारी अपनी मनमौजी करते है। वे पैसा से पैसा बनाना चाहते है जबकि कितने गरीब लोगों के परिवार आज भी 20 रू0 में अपने जीविका चला रहे। कितने परिवार आज भी एक ही समय चुल्हा जलते है हर दिन कमाने पर भोजन प्राप्त हो सकती है। आज भी मजदूरो के नाम पर छलावा है उसका खमियाजा मजदूर और किसान ही भूगते है। कारण कि अपने पेट के लिए इस ’ाहर से उस ’ाहर से मजदूरी करने जाते हैं जिससे एक रि’ता भी बन जाता है लोग आहिस्त से पहचाने लगते है और अपने अपने काम के अनुसार हमें बुलाते है सरकारी कानून, योजना इस रि’ते को तोड देता है। एक क्रम से अपना बना था टुट जाता है। बहुत कम समय हम सरकारी लाभ उठा पाते है।
सिलादेवी लुटा गांव की रहने वाली हैं। किसी के खेत में काम करके अपनी आजीविका चला रहे थे। इस कानून के आते ही गांव के ग्रामसभा के अघ्यक्ष के लोगो ने बिना बैठक कराए र्फाम भरकर ले गये और कहा कि इसके आधार पर अब सरकार सभी गांव वाले को काम देगी और यदि नही देगी तो बदले में बेरोजगारी भत्ता देगी। हम गांव वाले समेट लगभग 50 ंलोगो नेेे इकट्ठे काम का आवेदन दिया । आवेदन हमने 2007 में दिये हमें काम नही मिला करीब 15 दिनों के बाद हम लोगो ने बेरोजगारी भत्ते की मांग की उसके लिए डी डी सी, ब्लाॅक, कार्यालय, में चकर काटते- काटते 2008 हो गयें बेरोजगारी भत्ता नही मिला फिर हम लोगो ने उपायुक्त कार्यालय के समक्ष धरना देना ’ाुरू किये जिससे कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा है।
उधर भारतीय कम्युनिस्ट पाटी (माक्र्सवादी ) के जिला सांगठनिक कमिटि नरेगा में हो रहे गड़बड़ी को लेकर धरना दे रहे है। और लगातार यह मांग कर रही है कि बेरोजगारी भत्ता का बिना देर किये ग्रामीणों को दिया जाए तथा सभी जाॅबधारियों को काम दिया जाए इस मांग के साथ लगातार संघर्ष चल रहे है। सी पी आई (एम) के जिला सचिव गणे’ा कुमार बर्मा ने बताया कि नरेगा के द्वारा कटकमसांडी में लगातार गड़बडियां हो रही है। जिसकी जानकारी जिला के तमाम सरकारी पदाधिकारियों को है। इसके बावजूद मजूदरों को बेरोजगारी भत्ता नही दिया जा रहा है।
सी पी आई (एम) के जिला सचिव गणे’ा कुमार बर्मा ने कहा कि भारत सरकार द्वारा नरेगा कानून लागू करना@ करवाना जिला प्र’ाासन का परम कत्र्तव्य है। अपने पत्र में अपने प्रखण्ड विकास पदाधिकारी कटकमसांडी को पत्र का उल्लेख करते हुए बताए कि मजदूरों को सामूदायिक भवन में काम करने की जानकारी दी गयी परन्तु मजदूर काम करने नही आये। प्रखड विकास पदाधिकारी 03.10.07 को ये पत्र लिखते है। और मजूदरेां को लिखित सूचना 7.10.07 को दिया जाता है। इससे ये साफ प्रतीत होता हैं कि कानून के प्रावधानों का लाभ मजदूरों को न मिले इसलिए भ्रमक सूचना दिया। ऐसे भी इसका विरोध पार्टी नेे धरना के माघ्यम से उपायुक्त हजारीबाग के पास 90.10.07 को दर्ज करवाया है।
यदि प्रखण्ड विकास पदाधिकारी की बात को मान भी ले तो क्या बन रहे सामुदायिक भवन में 45 मजदूरों का विधिवत ( मजदूर को लगातार 14 दिन रोजगार सप्ताह में 6 दिन से अधिक नहीं) तरीके से कार्य दिया जाना संभव है? जाहिर है नही इसलिए ये मजदूर बेरोजगारी भत्ता पाने के योग्य है। क्या जहां समुदायिक नई भवन बनाया जा रहा है वहां मजदूरों के लिए नरेगा क तहत उपलब्ध सुविधाएं है? यदि सुविघाएं नही है तो मजदूर वहां काम करने क्यों जाएगी इसलिए भी मजदूरेां को बेरोजगारी भत्ता पाने के हकदार है। प्रखण्ड कृषि पदाधिकारी का ये कहना है कि 12 मजदूर ’ाहर में काम करने जाते है और यह बात भी सत्य है 12 क्या 12 से ज्यादा मजूदर बाहर काम करते हैं वे लोग रोज कमाते और रोज खाते हैं
यदि एक दिन भी बैठ जाए तब उनका परिवार कैसे चलेगा गांव में रोजगार नही मिलेगा तो काम की तला’ा में ’ाहर तो जाएगे ही। नरेगा कानून का उदे्द’य ही है। पलायन रोकना और ग्रामीणों को उसके गांव में 5 कि0 मी0 के अन्दर काम उपलब्ध करवाना है। इन तमाम कारणों के साथ उपायुक्त को पत्र लिखे जा चुके किन्तु नरेगा के तहत किसी भी लोगों को बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया गया है।
झारखण्ड में नरेगा फेल होने का बड़ा कारण पंचायत चुनाव का न होना लगता है। दुसरी ओर सरकार ने आदिवासी दलित समाज के परम्परागत सभा को मान्यता नहीं दी है। सरकारी पदाधिकारियों द्वारा ग्रामसभा का गठन किया जाता रहा है। उसके माघ्यम से नरेगा कानून को लागू करने में परे’ाानी हो रही है। जिससे लोगो को रोजगार नहीं मिल रहे है। ऐसी स्थिति में पलायन लाजमी है।
शनिवार, 5 जुलाई 2008
महिलाओं के गरीबी और भूख को मिटाने नरेगा कारगर नही हैं।
अलोका
(एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलो’िाप के तहत )
2 फरवरी, 2006 से देश के 200 जिलों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून 2005 लागू हो चुका है। झारखंड के 22 जिलों में से 20 जिले में इस कानून के अंतर्गत कार्य ’ाुरू हो चुका हैं देश के स्तर पर देखें तो सार्वधिक जिले झारखंड को ही मिला है। यह कोई खुश नसीबी की बात नहीं है। ज्ञात हो कि झारखंड की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं। भूख से मौत और पलायन एक बड़ी गंभीर समस्या है। लम्बे समय से झारखण्ड के कई जिले के लोग देखते आ रहे कई योजना आई और गई किन्तु झारखण्ड के गरीबी को समाप्त नही कर पाये और फिर एक कानून गरीबी और भूख को मिटाने के लिए लाया गया किन्तु इसे गांव में रह रही महिला को कोई लाभ नही मिल पा रही हैं क्योंकि झारखण्ड की गांव की महिलाएं निरक्षता के मार से उबर नही पाया हैं और रोजगार गांरटी कानून के द्वारा महिलाओं को कम लाभ उठा पा रही जिसका नतीजा यह हुआ कि वे दुसरे ’ाहरों की ओर पलायन कर रोजगार तला’ा कर रही हैंझारखंड जैसे राज्य में जहाँ गरीबी और बेरोजगारी है। लोग रोजी रोजगार के लिये पलायन कर रहे हो तथा किसी तरह 2 जून की रोटी जुगार मुश्किल हो रहा है। रोजगार गारंटी कानून को लागू करने व हर संभव हर स्तर पर लागू करने का प्रयास ना कामबयाब ही दिखाई दे रहा हैं। झारखण्ड के जिला गिरिडीह में महिलाअेां के पास रोजगार के नाम पर कुछ भी नही मिला कई दलित परिवार हैं जिनके लड़कीया गरीबी के कारण बेच दिये जा रहे हैं। एक “ाोध के आधार पर लिखी गयी किताब (गिरिडीह की बेटी रूप की मंडी )के आधार पर कई सौ लडकियां दूसरे “ाहरों में बाह कर बेच दी गयी। भूख और गरीबी ने सौदा सिफ लडकियो का ही होता रहा है।दलितो पर कार्यरत रामदेव ने लोगों को बताया कि कोई भी कानून लोगों के अधिकार के लिए है। इस कानून को जमीन में उतारने की जरूरत है। यह कानून आपके मांग और पहल पर निर्भर करता है। रोजगार गांरटी कानून, जाॅब कार्ड के बारे में लोगो को जानकारी सरकार कि ओर से देनी चाहिए। झारखण्ड में पंचायत चुनाव नही हुआ हैं। चुनाव नही होने के कारण कई सरकारी योजना जमीन स्तर पर नही उतारा जा सका हैं। जनती अपने व्यवस्था के अन्तर्गत नही आयेगी तब तक लोगो का विकास संभव नही तब तक भूख और गरीबी समाप्त नही हो सकती है। गिरीडीह जिले के महिलाएं रोजगार की खोज में हैं किन्तु इस योजना के बारे में महिलाओ को कम जानकारी हैं। जनकारी के अभाव में लोगो को योजना का लाभ नही हो पा रहा है।लक्ष्मी चरण महतो ने कहा कि आजादी के बाद हमें जो शक्ति मिली है। यह जनाधार को मजबूत करने के लिए मिला है। आनेवाले समय में हम अधिकार और अधिकारियों की यथार्थता को जानेंगे। इसके नहीं मिलने पर कानूनी हक प्राप्त करेंगे। महिलाओं को समाज में समान दर्जा प्राप्त होगा। हर बार महिलाएं पीछे छूट जाती रही है। उन्हे किसी भी योजना का लाभ नही हो पाता है। क्येां कि ब्लांॅक स्तर पर बिचैलिया किस्म के लोग ज्यादा रहते है। उनका कहना हैं कि यदि कुछ महिला को रेाजगार मिल भी गया तो तो उसे समय पर भूक्तान नही हो पा रहा है। जिससे आधा अधूरे काम कर महिला महानगर की ओर पलायन करने में ज्यादा रूचि ले रही है तथा काम कैसे-कैसे प्राप्त किया जा सकता है आवेदन का प्रारूप क्या होगा ? आप हमें कैसा सहयोग करते रहेंगे ? आपकी इसमें अभिरूचि की क्या पेशा है ? आदि क बारे में महिला को कोई जानकारी नही हैं।चंद्रशेखर ने कहा कि गिरीडीह के गंाव में नारेगा के तहत जितने काम दिये जाएगे उस काम से जो होना हैं उससे आम आदमी को कोई लाभ नही मिलेंगा क्यों कि यह क्षेत्र कोयला के रहा हैं आधी से ज्यादा महिलाएं कोयला निकाल कर प्रति दिन 150 रूपया कमाती है। इस योजना के तहत हमें सौ रूपये से भी कम पैसा मिलेगा तथा कोयला खदान से विस्थाप हुए समूदाय को तालाब और रोड़ से क्या मतलब वो तो अपने जीविका और अपने स्थान के लिए दर दर भटक रहें है।
महिला श्रमिक आज भी चैराहें पर
(एन. एफ. आई. एवं ए. आई. एफ फेलो’िाप के तहत )
अपने घर के अन्दर ’ाुरू से कार्यरत्त आबादी महिलाओं की रही है। ’ाायद आज के दौर में महिलाएं 18 घंटे काम कर रही है। उनके श्रम को पूरे दूनिया ने नकारा है। 21 वी सदी वाली दुनिया में महिलाओं के श्रम नगण्य रही है। श्रम की इस प्रक्रिया में महिलाओं का स्थान भविष्य दिखना संभव नहीं हैं। पूरे भारत में महिला कामगार की संख्या घर, मूहल्ले हर कस्बे, हर खेत, हर बस्ती और न जाने कहांं कहां उनके श्रम कर रही है और करती रहेंगी। पंूजी के बदलते दौर में किया गया श्रम किया गया श्रम ही श्रम माना गया है महिलाओं द्वारा किया गया काम सेवाभाव है। जबकि 21 वी सदी का भारत में पूरी- पूरी महिलाएंं अपने श्रम के बल पर अपना जीवन चला रही है बेटी पैदा होने अैर पांच साल की उम्र के बाद उनके श्रम ’ाुरू हो जाते है। इस श्रम को परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र ने कभी स्वीकारा ही नही। परिवार की नीवें रखने वाली, परिवार चलाने वाली महिलाएं होती है।पूरे भारत को नजदीक से देखे तब पाएगे कि महिलाए श्रमिक की संख्या सबसे ज्यादा है। भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान रहा है। उनकी श्रम के बल पर आज भी समाज, राज्य, परिवार चल रहे है। एक न्यू बुलेटिन में छपे समाचार के आधर पर वि’व बैक की 1989 की रिपोर्ट के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे के 35 प्रति’ात परिवारों की मुखिया महिलाएं है यह परिवार महिलाओ की श्रम, कमाई पर आश्रित है। रिपोर्ट के अनुसार निचले तबको के परिवारों में महिलाओ का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। उत्पादन कार्य में जुटी महिलाएं, श्रम बेचने, श्रम देने एवं आर्थिक उत्पादन पर निर्भर गरीब परिवार महिलाएं है। आज भी दुनिया में समान मजदूरी की लड़ाई जारी है। गरीब परिवार के महिलाओं को आज भी पुरूषो के मुकाबले कम आय (पैसे) मिलते है। परिवार में उनके श्रम को सेवा के रूप में लिया जा रहा है। घर की सुफाई से लेकर बाहर कम किमत पर कार्य कर रही है। इस कार्य की गणना कही भी दर्’ााया नही गया है। एवं गणना नही की जाती है। 21 वी सदी का भारत में सरकारी विभाग, हर प्रतिष्ठान, हर संस्थान, संडकों पर खेतो पर रसोई घर में बाजार, स्वास्थ्य क्षेत्र में हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की मांग बढ़ गयी है। कम पैसे में ज्यादा श्रम देने वालेेेेे आज कोई वर्ग है वह है महिला वर्ग । भारत में महिला श्रमिक के संगठन बनने नही दिया गया है। वि’व की महिला श्रमिकों की लड़ाई क्लारा जेटिलन ने महिलाओं की आजादी की मांग को वि’व स्तर पर उठाया था। भारत में महिलाओं ने अपने अधिकार के प्रति सजग हुई पर गति काफी धीमी रही। सेवा के भावना को तोड कर धीरे- धीरे महिलाएं अपने श्रम को मूल्यों के साथ जोड़ना ’ाुरू किया। वह मूल्य काम घंटे के हिसाब से काफी कम है। आज भी भारत के सरकारी नौकरी करने वाले 2 प्रति’ात महिलाओं को छोड़ कर हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के श्रम को आय काफी कम है। इस प्रकार के कार्य सीधे अर्थो में अदृ’य रहते है एवं महिलाओं के योगदान पर राष्ट्रीय मानव संसाधन एवं आर्थिक नीतियां कुछ नहीं कहती।क्या कारण है कि महिला श्रमिक वर्ग सबसे ज्यादा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत्त है। 1991 में किये गये जनगणना के अनुसार 95 प्रति’ात महिलाएं अंसगठित क्षेत्र में कार्यरत्त है। 5 प्रति’ात महिलाएं पुरूषों के कामगार संगठन ट्रेड युनियन या अन्य संगठन में एका हो लेते है। असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिक जहां उन्हें अच्छी सेवा’ात्र्तो एवं बराबर (न्यायपूर्ण मजदूरी) मजदूरी नही मिलती है। न ही वहां उन्हें उत्पादकता बढ़ाने के अवसर मिलते है। काम करने वाले स्थानों में पानी, ईधन, स्वास्थ्य, सुविधा, एवं पलना घर जैसी सुविधाओं का अभाव रहता है। यौन, उत्पीड़न इस क्षेत्र में अत व्याप्त है। ठेकेदार, कुली, मिस्त्री एवं अन्य पुरूष श्रमिक लडकियों, महिलाअेां का यौन ’ाोषण करते है। गरीबी, जानकारी का अभाव, लोकलाज के कारण बात सामने नही आ पाती है।अंसगठित श्रमिक समाजिक सुरक्षा विधेयक 2007 में महिला श्रमिक कों श्रमिक नही माना है। लोकसभा के स्थाई समिति की कामरेड सुधाकर रेड्डी की अघ्यक्षता में जारी की गई रपट में अंसगठित श्रमिक समाजिक,सुरक्षा विधेयक को प्रस्तुत किया है। उसके कुछ महत्वपूण मुद्दे पर टिप्पणी की जा सकती है। 1। इस विधेयक में उन महिला श्रमिकों को श्रमिक नही माना है जिन्हें वेतन, मजदूरी या बाजार से मुनाफा नही मिलता। वे श्रमिक जो उन संस्थानों में काम करते है जहां 10 से अधिक श्रमिक नियोजित ह, भी सम्मिलित नहीं है, परन्तु यदि संगठन क्षेत्र में कार्यरत होने के बावजूद भी अन्य सामाजिक सुरक्षा काननू का लाभ नही मिलता तब वे सम्मिलत माने जायेंगे। 2। यह विधेय में समाजिक सुरक्षा के लिये श्रमिकों को एक हिस्सा जमा करने का प्रावधान हे। विधेयक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण निधि स्थापित करता है परन्तु इस निधि का प्र’ाासन एवं सामाजिक सुरक्षा के लिए व्यय सम्बन्धी अन्तिम निर्णय के अधिकार सरकार को ही है। 3। सभी अंसगठित श्रमिको का सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करने के लिये पंजीकरण कराना होगा और स्वयं इसके लिए आवेदन करना होगा। 4. विधेयक में सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के गठन के प्रावधान हे। परन्तु वे स्वायत्त (र्आटोनोमस) नही होगे इन राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय बोर्डो में सदस्यों का नामांकन सरकार करेगी। बोर्डो को सिफारि’ा, सुझाव, योजनाओ की समीक्षा, वि’लेषण आदि के अधिकार है। उन्हें कुछ प्र’ाासिनक अधिकार भी है। 5. सह विधेयक सरकार की कई वत्र्तमान योजनाओं को सम्मिलित कर लेता है परन्तु जो सुरक्षा लाभ दिये है वे बहुत कम स्तर पर है। जैसे 500 रूपयें मातृत्व लाभ 200 रूपये वृद्धावस्था लाभ, स्वास्थ्य के लिये अधिकतम 30,000 रू0 एक वर्ष में आदि। इनमें अधिकतर बीमा आधरित लाभ है। इन रा’िायों का औचित्य अस्पष्ट है। 6. यह विधेयक असंगठित श्रमिकों को आजीविका, नियोजन, जल, जंगल, जमीन स्वयं का घर आदि के सामाजिक सुरक्षा अधिकार नही देता। इसमे श्रम अधिकार, सामाजिक सुरक्षा अधिकार, दलित एवं महिला और प्रवासी श्रमिकों के अतिरिक्त सामाजिक सुरक्षा अधिकार आदि क प्रावधान नही है। सेवा ‘’ार्ते, कार्य के समय सुरक्षा आदि के भी प्रावधान नहीं है। विधेयक विवाद सुलझाने के प्रावधान सम्मिलत करता है परन्तु असंगठित श्रमिकों के प्र’ाासन से उत्पन्न विवादों जैसे विस्थापन, आजीविका सम्बन्धित, पुलिस या नगर- निगम द्वारा आक्रमकता सम्बन्धित विवादों को सुलझाने पर गौन है। खेतीहर महिला श्रमिक पूरा काम का जिम्मा लिए हुए है। बीज डालने से निकावन तक खाना बनाने से लेकर बाजार, बच्चे, पति की सेवा तक करती है। उत्पादन के इस कार्य में प्राचीन समय से महिलांए अपना योगदान देती आ रही है। लेकिन महिला किसान के रूप महिलाओं को कभी स्वीकारा नही गया है। उसका श्रम को महत्व भी नही दी गयी है। उनके बने भोजन को चाट कर भी श्रम की बात नहींं कही गयी है। उसी काम को पुरूष द्वारा बाजार में मूल्यों के साथ काम करते हैं तब वह श्रम में माना जाता रहा है। खेत से घर तक का पूरा काय्र महिलाएं अपने बल पर करती रही है। इसक कार्य को करने में उन्हें श्रमदान करना पड़ता है।भारतीय संविधान प्रंजातंत्र एवं समानता मूलक रहा है। परन्तु यह वास्तव में समानता की बात स्वीकार सकते क्या? दे’ा में कमजोर तबको तक यह अधिकार पहुंच पाई है। सत्य कहे तो नही पहुंच पाई हैं। सामनता के अभाव के बिना महिला श्रमिक वर्ग ’ाोषण में ढकेले गयें है। वे मुख्यधारा से आज भी बाहर है और जीवन की कुरूरतम से भाग कर अपना बचाव करते है। 60 साल आजादी वाला दे’ा में महिलाएं आज भी मुत वाले चुल्हा- चैका से साथ कम किमत पर काम करने बाहर जाना पड़ता है। आज भी 65 प्रति’ात महिलाएं अ’िाक्षा के ’िाकार है। सबसे ज्यादा गरीब तपका वर्ग महिला है। जिन्होने लम्बे- समय से मुत में श्रम दान देती आ रही है आज भी महिलाएं 18 घंटा काम करती है एवं आम महिला श्रमिक को सामाजिक सुरक्षा, मानवाधिकार, समान पारश्रमिक, कारगार व्यवस्था, आवका’ा, मातृत्व लाभ, विधवा, गुजारा भत्ता, कानुनी सहायता से आज भी वंचित है।अलोकाएच
बी रोड़ थड़पखना
महिला होने पर नरेगा के लाभ से वंचित ( अलोका एन. एफ. आई एवं ए. आई एफ फेलोसिप के तहत )
।निजीकरण के इस दौर में पूरे भारत में तेजी से बेरोजगारी बढ़ी है। इस बेरोजगारी ने भारत के हर प्रंात मे राजनीति, समाजिक, आर्थिक स्थिति को चरमरा दिया हैै। जिससे आने वाले भविष्य एवं ग्रामीण जनजीवन पर व्यापक असर पड़ा हैं हर क्षेत्र मे बेरोजगारी की भार से समूचित समाज की संरचना ही बदल गयी है। कही पलायन तो कही भूख से मौत कही लोग गरीबी और बेरोजगारी के कारण गांव ही बेच दे रहे हैं। इस वक्त भारत सरकार ने लोगो को राहत के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कानून बना कर लोगो को राहत देने का काम किया। किन्तु यह कानून क्या महज कानून ही बन कर ही रह जाएगे। आजादी के बाद ग्रामीणों को साल ंमें 100 दिन के काम के अधिकार की महत्व उतनी हैं जीतना जीवन के लिए पानी। झारखण्ड में इस कानून का खास महत्व है। झारखण्ड एक ऐसा राज्य है। जहां प्राकृतिक संपदा सबसे ज्यादा होने के बावजूद यहा के लोगो को रोजगार का अभाव है। लूट खसोट की व्यवस्था ने पलायन करने पर मजबूर कर दिया है।इस कानून को लागू कराने के लिए दे’ा भर में अरूणा राय, ज्यां द्रेज ,निखिल डे नेतत्व में आंदोलन हुआ था जिसका परिणाम हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांंरटी कानून 2005, महाराष्टा में 1977 से लोगों को रोजगार के अधिकार व कानून बनने के बाद,ग्रामीण बेरोजगार अकु’ाल, नरेगा के साथ झारखण्ड राज्य में इस कानून को परिकल्पित की गई है। फरवरी 2006 को लागू होने के उपरान्त प्र’ाासन के कच्छप चाल से रोजगार के अधिकार से वंचित किये जाने लगी चाईबासा की ग्रामीण गरीब, बेरोजगार जनता।वही चाईबासा के गांव में इस कानून का पालन नही किया गया है। खुटपानी ब्लाक के उपर टोला,टोनटो ब्लाक के झीरजोर, कुईल सुटा,रूटागुटू सारजोम बुरू उडेलकम में रोजगार कार्ड के बारे में वहां के लोग नही जानते हैं। जबकि वह गांव आदिवासी क्षेत्र है। वहां कि 528 परिवार के लोग रह रहें उन्हे रोजगार की जरूरत हैं। इस गांव को आवेदन भराया नही गया हैं। ग्राम प्रधान इस गांव के लोगो को अलग कर के आवेदन दिया गया। समाजिक कार्याकत्र्ता ज्योत्सना तिर्की ने बताया कि वहां के ग्रामीणो को महिला होने के कारण अलग कर दिया हैं। जबकि उन परिवारों को रोजगार की जरूरत हैं। किस गांव में आवेदन भरा गया कि नही इसकी जानकारी या निरक्षण नही किया गया हैं। बल्कि नारेगा प’िचम सिंहभमू में कागजो पर चल रहें हैं। जिसके परिणाम हैं कि कई गांव में नारेगा कानून को लोग नही जान पायेे हैं। जबकि इस कानून को लोगो तक पहुंचाने का काम ग्राम प्रधान और ब्लाॅक पदाधिकारी के द्वारा जानकारी देना हैं वह भी नही हो रहा हैं।उन्होने बताया कि पंजीकरण के लिए पंचायत सेवक द्वारा एक लिस्ट जारी किया गया है। जिसमें तय कर दिया गया हैं कि किनको आवेदन करना हैं। ग्रामीण क्षेत्र में बहुत ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें वास्तव में रोजगार की आव’यकता हैं। 2 रूपये में आवेदन र्फाम बेचे जा रहे है। 25 से 45 रू0 में फोटो खिचाया जा रहा हैं नारेगा से एक नया व्यापार का जन्म हो रहो हैं।चाईबासा के सुदूर गांव मे केन्द्र सरकार द्वारा इस कानून के बारे में अखबार, रेडियों, दुरदर्’ान द्वारा जनता को जानकारी दी गयी हैंंं। चुंकि ब्लॅाक में कई प्रकार के योजनाएं चल रही हैं। यह पहला कानून हैं जिससे दे’ा में गरीबी और भूख से मौत को रोकने के लिए बनाया गया है। इसे बार- बार लोगो को अधिकार के प्रति सजग करने के लिए चेतन का विकास का प्रयास ब्लाॅक के द्वारा करना चाहिए। जिससे ब्लाॅक के अधिकारी निभा नही पा रहें। चाईबासा के टकराहातु, डिलियामार्चा गांव में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के बारे में जाॅब कार्ड की स्थिति का जायजा लेना तथा आवेदन करने पर हो रहे समस्या पर बात कि गर्यी। मालती वानरा ने बताया कि चाईबासा में रोजगार गारंटी कानून के तहत लोगो को सफेद कागज में आवेदन कर सकते हैं, आवेदन के बाद आवेदक को जाॅब कार्ड उपलब्ध किया जाएगा । जाॅब कार्ड मिलते ही रोजगार के लिए आवेदन करें जाॅब कार्ड में फोटो साटना तुरन्त जरूरी नही आप बाद में भी फोटो दे सकते है। आवेदन देना , फोटो खिचवाना तथा जाॅब कार्ड निः शुल्क में ग्राम सेवक द्वारा किया जाएगा तथा आप अपने जाॅब कार्ड द्वारा 15 दिन का काम दिया जाएगा इस कानून के तहत 100 दिन का रोजगार की व्यवस्था केन्द्र सरकार द्वारा किया गया है। किन्तु महिला संदर्भ केन्द्र के द्वारा किये गये निरक्षण से पाया गया कि चाईबासा में अल्पसंख्यक 47 परिवार को कार्ड की की प्राप्ति हुईै है। बाकी लोगों को अभी तक नही मिली है। बड़ी संख्या में गांव में लोगो को जाॅब कार्ड नही मिल पाया हैं कई गांव में तो किसी - किसी का फोटो जमा नही है। यह भी पाया गया कि दुसरे के जाॅब कार्ड में किसी और व्यक्ति का फोटो सटा हुआ है। गांव में पंचायत सेवक द्वारा लोगो को आवेदन करने की इजाज+त नही दे रहें हैं। कई तरह के गडबडी यहां हो रहे है। हमे चाहिए की हम एक जुट हो कर अपने अधिकार के लिए आंदोलन करे ताकि सरकारी पदाधिकारी को हम अपने अधिकार के प्रति चेतावनी दे सके हमारी ग्राम सभा में इतनी ताकत है कि हम किसी पदाधिकारी से हम अपना हक ले सके।
अलोका
शुक्रवार, 6 जून 2008
मैं तुझे फ़िर मिलूंगी.....
अमृता प्रीतम जी का लिखा हुआ हो और गुलजार जी की आवाज़ हो तो इसको कहेंगे सोने पर सुहागा ...। यह कविता उन्होंने अपने आखिरी दिनों में इमरोज़ जी के लिए लिखी थी । इस कविता का एक एक लफ्ज़ प्यार का प्रतीक है । अमृता बहुत बीमार थी उन दिनों ...वह अपने आखिरी दिनों में अक्सर तंद्रा में रहती थी । कभी कभी एक शब्द ही बोलती लेकिन इमरोज़ के लिए हमेशा मौजूद रहती पहले की तरह ही हालांकि इमरोज़ पहले की तरह उनसे बात नही कर पाते थे पर अपनी कविता से उनसे बात करते रहते .। .एक बार खुशवंत सिंह जो अपने घर में अक्सर छोटी छोटी सभा गोष्टी करते रहते थे ..इन दोनों को कई बार बुलाया पर यह दोनों नही जाते थे तब उन्होंने पूछा अमृता को फ़ोन कर के पूछा था कि तुम बाहर क्यों नही निकलते हो ..क्या करते रहते हो सारा दिन तुम लोग ?अमृता ने जवाब दिया गल्लां ""[बातें ]उन्होंने हंस कर कहा इतनी बातें करते हो तुम दोनों की खतम नही होती है तब अमृता सिर्फ़ हंस कर रह गई ..पता नही दोनों कैसी क्या बातें करते थे कभी शब्दों के माध्यम से कभी खामोशी के जरिये पर दोनों को साथ रहना पसंद था एक दूसरे के आस पास रहना पसंद था
सोमवार, 26 मई 2008
इन संस्थानों को महिला की सहायता के लिये चलाया जारहा हैं
Centre for Women's Development स्टडीज
शनिवार, 3 मई 2008
अति सुन्दर काया
आखे जो झील मे दुबे हो
कमर के सुन्दरता
मेरी अक्खो मे घूमती हो
पुरा का पुर संसार
कायल हो गया
झील सी आखो मे
